

शिक्षा और उद्योग के गठजोड़ की ये ख़बरें सुनने में बड़ी लुभावनी लगती हैं। यूपीईएस और किनड्रिल का यह सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी काग़ज़ पर तो किसी क्रांति से कम नहीं दिखता—डिज़ाइन और टेक्नोलॉजी का संगम, लाइव प्रोजेक्ट्स, रिसर्च, ग्लोबल नेटवर्किंग, बड़े-बड़े शब्द और उससे भी बड़े सपने। मगर सवाल वही है कि इस सबका लाभ ज़्यादा किसे होगा—छात्रों को, फैकल्टी को या फिर कंपनी को, जिसे भारतीय टैलेंट सस्ता और सीधा मिलता है?
विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और किनड्रिल की कंट्री लीडर के बयान पढ़कर ऐसा लगता है मानो स्वर्ग के दरवाज़े खुल गए हों। “मानव-केंद्रित डिज़ाइन”, “भविष्य के लिए तैयार टैलेंट”, “इकोसिस्टम थिंकिंग”—ये शब्द सुनकर छात्र का दिमाग चमकता है, लेकिन उसके जेब का बोझ और बढ़ जाता है। शिक्षा महंगी है, लेकिन वादे मुफ्त में बाँटे जाते हैं।
सच तो ये है कि कंपनियाँ अब विश्वविद्यालयों को अपने R&D हब की तरह इस्तेमाल करने लगी हैं। रिसर्च भी छात्रों का, इनोवेशन भी छात्रों का, और फायदा? उद्योग का। फैकल्टी को थॉट लीडरशिप का मंच मिलेगा—मतलब पॉवरपॉइंट पर रंगीन स्लाइड्स बनाने का मौका।
हाँ, यह साझेदारी छात्रों को नए रास्ते दिखा सकती है, अनुभव दिला सकती है, लेकिन जब तक देश का मूलभूत ढांचा—स्कूलों से लेकर सरकारी कॉलेजों तक—बदहाल है, तब तक ऐसी चमचमाती खबरें ज़्यादा ब्रॉशर मैटेरियल जैसी लगती हैं, ज़मीन पर असर कम।
फिर भी, मानना पड़ेगा कि यह कदम शिक्षा और उद्योग की खाई को पाटने की दिशा में है। तंज तो रहेगा, लेकिन सकारात्मकता भी यही कहती है कि अगर वाकई छात्र इससे कुछ ठोस सीख पाते हैं और सिर्फ़ फोटो-ऑप का हिस्सा नहीं बनते, तो ये सेंटर ऑफ एक्सीलेंस सच में एक्सीलेंस दिखा सकता है। वरना, यह भी “इनोवेशन लैब” की लंबी सूची में एक और बोर्ड बनकर रह जाएगा, जिस पर धूल जमती है और बच्चे सोचते हैं—कभी हमने यहाँ कुछ सीखा था क्या?








