
राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन पर आरोपों का बोझ इतना होता है कि आम इंसान होता तो अब तक शर्म से ग़ायब हो जाता, लेकिन मंत्री जी का आत्मविश्वास देखिए—जैसे मुख्यमंत्री की कुर्सी इन्हीं की इंतज़ार में हो। घोटालों की लंबी फेहरिस्त, भगोड़े की छवि और ऊपर से आय से अधिक संपत्ति का मामला… फिर भी तेवर ऐसे कि मानो पूरा तंत्र इन्हीं के इशारे पर चल रहा हो।
परिवारवाद की नमी में पले ये साहब जनता की सेवा से ज़्यादा वंश की विरासत बचाने में व्यस्त रहते हैं। आपदा के दौर में जब डीएम और एसपी मौके पर डटे रहकर हालात संभाल रहे थे, तब मंत्री जी का रौब देखने लायक था। डीएम ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया, लेकिन साहब के तेवर में इतनी अकड़ थी कि नम्रता के लिए जगह ही नहीं बची। उल्टा तिरछी नज़र और ऊंची आवाज़—जैसे प्रशासनिक अमला उनका निजी स्टाफ हो।
असल समस्या यही है कि जब सत्ता सेवा का माध्यम बनने के बजाय अहंकार का अखाड़ा बन जाती है, तब नेता की पहचान उसके काम से नहीं बल्कि उसके केसों और कारनामों से होने लगती है। मंत्री जी भी उसी ढांचे में फिट बैठते हैं—जहां तमीज़ पीछे छूट जाती है और घोटाले आगे बढ़ जाते हैं। जनता सब देख रही है, और शायद यही सबसे बड़ी सज़ा है कि लोग अब इन्हें मंत्री कम, “ढचेरु चंद” ज़्यादा मानने लगे हैं।








