“देहरादून आपदा में डीएम सविन बंसल बने उम्मीद का सहारा, त्वरित कार्रवाई और जिम्मेदारी से जीता भरोसा”

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देहरादून की आपदा ने हालात बिगाड़े तो सही, मगर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग रही। जिलाधिकारी सविन बंसल ने जो त्वरित फैसले और जमीनी स्तर पर मौजूदगी दिखाई, उससे यह साफ झलकता है कि सिस्टम जब चाहे तो जाग भी सकता है और दौड़ भी सकता है। रातभर न सोना, लगातार मॉनिटरिंग करना, एसएसपी के साथ 8 किलोमीटर पैदल चलकर कटे हुए गांव तक पहुंचना—ये बातें महज औपचारिकता नहीं थीं, बल्कि जिम्मेदारी का सबूत थीं।

कार्लीगाड में फंसे 70 लोगों को निकालना, उन्हें सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाना और राहत शिविरों में खुद मौजूद होकर पीड़ितों को ढांढस बंधाना—ये कदम दिखाते हैं कि डीएम केवल कुर्सी पर बैठकर आदेश देने वाले अफसर नहीं, बल्कि मौके पर डटे रहने वाले अधिकारी हैं। यह भी सच है कि प्रोटोकॉल ड्यूटी खत्म करके सीधे कंट्रोल रूम पहुंचना और वहां से राहत कार्यों का संचालन करना आसान बात नहीं, लेकिन इस बार ऐसा हुआ।

तंज यहां यही है कि जब पूरा अमला अक्सर “बैठकों” और “कागजी कार्यवाही” में ही अटका रहता है, तब डीएम का इस तरह ग्राउंड जीरो पर उतरना बाकी प्रशासनिक तंत्र को भी आईना दिखाता है। आपदा प्रबंधन का असली अर्थ यही है—समय रहते मौके पर पहुंचना, लोगों का भरोसा बनना और डर के बीच उम्मीद का सहारा देना।

व्यंग्य यह भी है कि जनता अब ऐसे त्वरित कदमों को देखकर हैरान हो जाती है, क्योंकि उसे आदत ही पड़ गई है “आपदा के बाद रूटीन बहानों” की। जब कोई डीएम रातभर जागकर खुद पैदल चलकर गांव तक पहुंचता है, तो लोग इसे अलग और खास मान लेते हैं, जबकि यह तो सामान्य जिम्मेदारी होनी चाहिए।

फिर भी कहना पड़ेगा कि इस आपदा में डीएम ने केवल आदेश नहीं दिए, बल्कि उस आदेश को जीकर दिखाया। यही फर्क है एक “अफसर” और एक “जिम्मेदार इंसान” में। अगर बाकी सिस्टम भी इसी तरह जागा रहे, तो शायद अगली आपदा में केवल रेस्क्यू की तस्वीरें नहीं, बल्कि पहले से तैयारियों की मिसालें भी देखने को मिलें।

Khushi
Author: Khushi

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