“वरिष्ठ पत्रकार अवनीश प्रेमी की पुत्री दिव्यांशी वर्मा ने ABVP प्रत्याशी के रूप में DU छात्रसंघ चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर दर्ज की ऐतिहासिक जीत”

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तीन पीढ़ियाँ—दादा, पिता और अब बेटी। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती, मगर यह सच्चाई है। हरिद्वार की बेटी दिव्यांशी वर्मा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस स्थित शहीद भगत सिंह कॉलेज में उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर पूरे उत्तराखंड का मान बढ़ाया है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव वैसे भी भारतीय राजनीति का ट्रेनिंग ग्राउंड कहे जाते हैं। यहाँ से निकलकर जाने कितने चेहरे देश की बड़ी राजनीति तक पहुँचे हैं। ऐसे में ज्वालापुर की गलियों से निकलकर दिव्यांशी का इस मैदान में कदम रखना और पहली ही पारी में उपाध्यक्ष पद तक पहुँचना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है।

अब ज़रा पृष्ठभूमि देखिए—
बाबा स्व. मधुकांत प्रेमी लोकतंत्र सेनानी और वरिष्ठ पत्रकार रहे, पिता अवनीश प्रेमी उत्तराखंड की पत्रकारिता में जाना-पहचाना नाम हैं, और अब पोती ने राजनीति के मैदान में एंट्री मार ली। यानी परिवार का हर अध्याय इतिहास से संवाद करता रहा है—कभी पत्रकारिता से, कभी समाजसेवा से, और अब छात्र राजनीति से।

यहाँ तंज करने का मन करता है—
“आरएसएस की पाठशाला” कहिए या फिर ABVP की पॉलिटिकल लैबोरेटरी, जहां से पढ़कर निकलीं दिव्यांशी। विपक्ष वाले भले ही इसे “संघी प्रयोगशाला” कहें, लेकिन हकीकत यही है कि अगर कोई छात्र नेता ABVP से चुनाव जीतता है, तो उसे संगठन और विचारधारा की मजबूत ज़मीन भी मिलती है। दिव्यांशी के लिए यह जीत सिर्फ पद हासिल करने भर की बात नहीं, बल्कि एक पॉलिटिकल करियर का शुरुआती ट्रेलर है।

व्यंग्य यह भी है कि जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव में गुटबाज़ी, पोस्टरबाज़ी और बैनरबाज़ी आम बात है, वहां उत्तराखंड की बेटी “वोट की राजनीति” का पाठ पढ़ा रही है। दिल्ली की सियासी गलियारों में गूंजे नाम का असर हरिद्वार की गलियों तक पहुँच रहा है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि—
दादा ने लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी, पिता ने पत्रकारिता से समाज को आईना दिखाया, और अब बेटी राजनीति में जनता की आवाज़ बनने की ओर बढ़ रही है। तीन पीढ़ियाँ, तीन मोर्चे—पर लक्ष्य एक ही: समाज और देश का नाम रोशन करना।

और हाँ, उत्तराखंड की राजनीति के लिए यह एक संदेश भी है—नई पीढ़ी अब “दिल्ली की चौखट” पर दस्तक दे रही है। कल यह आवाज़ ज्वालापुर की गलियों से निकलकर संसद के गलियारों में भी गूंज सकती है।

सवाल सिर्फ इतना है कि दिव्यांशी की यह पारी छात्र राजनीति तक सीमित रहेगी या फिर यह आगाज आने वाले वक्त में “बड़ी पारी” का हिस्सा बनेगा?

Khushi
Author: Khushi

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