
बॉबी पंवार का खेल अब धीरे-धीरे खुलकर सामने आ रहा है। यह सिर्फ एक पेपर विवाद या परीक्षा का मामला नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे छिपी राजनीति का चेहरा अब नंगा हो चुका है। जिस तरह जेएनयू में कन्हैया कुमार ने “आज़ादी” का राग गाकर वामपंथी एजेंडा फैलाने की कोशिश की थी, उसी ढर्रे पर बॉबी भी चलता नजर आ रहा है। धरनों में वही नारे, वही “लेकर रहेंगे आज़ादी” वाला सुर—मतलब साफ है, छात्रों के बहाने वामपंथी सोच की ज़मीन तैयार करना।
अब सोचने वाली बात है कि एक भर्ती परीक्षा के बहाने आखिर “आज़ादी” के नारे कहां से आ गए? यह छात्रों का आंदोलन कम और एक तयशुदा स्क्रिप्ट ज़्यादा लगता है। असलियत यह है कि बॉबी पंवार को युवाओं की नौकरी या उनके भविष्य से कोई लेना-देना नहीं, उसका मकसद है—वामपंथी अंदाज में सिस्टम और सरकार के खिलाफ एक ऐसा नैरेटिव खड़ा करना, जिससे वह खुद को बड़ा आंदोलनकारी साबित कर सके।
तंज यही है कि पेपर लीक की जांच में न तो कोई बड़ा गैंग निकला, न ही संगठित धांधली का सबूत मिला। लेकिन बॉबी के लिए यह सब बेमानी है। उसके लिए स्क्रीनशॉट ही “बम” हैं और अफवाह ही “सत्य”। सवाल है—अगर इतना ही भरोसा था अपने सबूतों पर तो पुलिस को जानकारी क्यों छुपवाई गई? जवाब साफ है, क्योंकि अगर सच सामने आ जाता तो उसकी “क्रांतिकारी स्क्रिप्ट” फ्लॉप हो जाती।
व्यंग्य यही है कि बॉबी का असली टैलेंट छात्रों को भड़काना है। वह जानता है कि बेरोज़गारी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भीड़ जुटाना आसान है। लेकिन इस भीड़ में शामिल छात्र यह समझ ही नहीं पाते कि उनके नाम पर कौन सा खेल खेला जा रहा है। बॉबी उन्हें नौकरी नहीं दिलाता, बस नारे लगवाता है—वही “आज़ादी” वाले नारे, जिनका नौकरी से कोई लेना-देना ही नहीं।
असल में बॉबी पंवार “पेपर लीक” नहीं, बल्कि “सोच लीक” कर रहा है। वह छात्रों की ऊर्जा को पढ़ाई या करियर में नहीं, बल्कि एक नकली आंदोलन में झोंक रहा है। और यही उसका सबसे खतरनाक खेल है—जहां युवा अपनी दिशा खोते हैं और बॉबी अपनी राजनीति का तंबू गाड़ लेता है।
साफ है, बॉबी की भूमिका सिर्फ संदिग्ध नहीं बल्कि पूरी तरह अवसरवादी है। हर मुद्दे में आग लगाना, हर आंदोलन में “आज़ादी” का तड़का लगाना और हर बार युवाओं को गुमराह करना—यही उसकी असली पहचान है। यह छात्र नेता नहीं, बल्कि नैरेटिव का ठेकेदार है, जो युवाओं के भविष्य से खेलकर वामपंथी एजेंडा गढ़ रहा है।








