
उत्तराखंड की भर्ती परीक्षाओं पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं और इस बार मामला इतना गंभीर है कि सरकार को सीधे सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में एसआईटी गठित करनी पड़ी। 21 सितंबर को आयोजित स्नातक स्तरीय परीक्षा के प्रश्नपत्रों के फोटो आउट होने की घटना ने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर तगड़ा प्रहार किया है। थाना रायपुर में दर्ज मुकदमे के बाद अब पुलिस अधीक्षक ऋषिकेश के नेतृत्व में बनी एसआईटी पूरे प्रदेश में छानबीन कर रही है।
26 सितंबर को एसआईटी की टीम ने सीधा UKSSSC कार्यालय में दबिश दी। वहां अधिकारियों और कर्मचारियों से घंटों पूछताछ चली, रिकॉर्ड खंगाले गए और सुरक्षा मानकों से जुड़े दस्तावेज तलब किए गए। यह पूछताछ सिर्फ औपचारिकता नहीं थी, बल्कि सवाल सीधे उन व्यवस्थाओं पर थे जिन्हें ‘फूलप्रूफ’ बताया जा रहा था। परीक्षा के दौरान सुरक्षा का जिम्मा देख रही कंपनी के पदाधिकारियों से भी पूछताछ की गई, ताकि यह साफ हो सके कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई।
टीम ने साफ निर्देश दिए कि अभियुक्तों से जुड़े हर दस्तावेज और अन्य महत्वपूर्ण कागजात तुरंत उपलब्ध कराए जाएं। यानी अब फाइलों को दबाकर रखने का खेल नहीं चलेगा। एएसपी जया बलूनी की अगुवाई में ताबड़तोड़ कार्यवाही यह संकेत दे रही है कि इस बार जांच को न सिर्फ गंभीरता से लिया जाएगा बल्कि उन तक भी हाथ पहुंचेंगे जो अब तक परदे के पीछे सुरक्षित बैठे थे।
इस कदम का राजनीतिक और सामाजिक असर भी बड़ा है। एक तरफ यह कार्रवाई धामी सरकार के उस दावे को मजबूत करती है कि भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं होगा, वहीं दूसरी तरफ उन लोगों की पोल खोलती है जो बार-बार परीक्षा तंत्र को कमजोर कर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। सवाल बड़ा है कि आखिर ये ‘लीक सिंडिकेट’ बार-बार नया चेहरा बदलकर कैसे सक्रिय हो जाता है? और सबसे अहम—क्या इस बार कार्रवाई सिर्फ छोटे-मोटे दलालों तक सीमित रहेगी या फिर उनकी डोर हिलाने वालों तक भी पहुंचेगी?
फिलहाल संकेत यही हैं कि इस बार सिस्टम में बैठा कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। और यही संदेश युवाओं के लिए सबसे बड़ा भरोसा बन सकता है कि अब परीक्षा का मतलब वाकई मेहनत और योग्यता से होगा, न कि दलालों की जेब गरम करने से।








