
सरकार ने पेपर लीक मामले में SIT गठित कर दी, लेकिन अपने ही सांसद साहब सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। अब इसे क्या कहा जाए—चिंता, चतुराई या चालाकी?
बयान सीधा है, लेकिन इशारा गहरा। मतलब साफ है कि अपने ही मुख्यमंत्री पर भरोसा आधा-अधूरा है। SIT बनाकर सरकार यह दिखाना चाहती है कि मामले की तह तक जाएगी, मगर पूर्व मुख्यमंत्री का सुर कुछ और ही है। लगता है जैसे SIT से ज्यादा भरोसा दिल्ली दरबार की एजेंसी पर है।
व्यंग्य यह है कि विपक्ष तो सरकार को घेर ही रहा था, लेकिन अब अपने ही घर से “कमजोरी की दस्तक” आ गई। विपक्ष को बैठे-बिठाए तोहफ़ा मिल गया—कहने को कि देखिए, जब अपनी ही पार्टी के बड़े नेता सरकार पर शक कर रहे हैं, तो फिर जनता क्यों भरोसा करे?
राजनीति का यही मज़ा है—जहाँ भरोसा जताना था, वहाँ सवाल उठा दिए गए। और सवाल भी ऐसे जो सीधे मुख्यमंत्री की साख पर चोट करते हैं। अब इसे “ईमानदारी” कहें या “आंतरिक जंग”, पर इतना तय है कि बयानबाज़ी ने विपक्ष की चाय मीठी कर दी है।
एमपी साहब भूल जाते हैं कि जनता अब समझदार है। जब अपनी ही सरकार को कमज़ोर करने का खेल चले, तो लोग यही कहते हैं—ये जंग बाहर के खिलाफ नहीं, घर के अंदर ही लड़ी जा रही है।








