
असल में अगर डीएम सवीन बंसल हर जिले में होते, तो प्रशासन सिर्फ कागजों और आदेशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों की तकलीफें सीधे उनके कक्ष तक पहुँचतीं और समाधान भी तत्काल। शोभा रावत जैसे असहाय, विधवा और दिव्यांग बच्चों वाली मां के मामले में डीएम ने जो सक्रियता दिखाई, वह कई बार सुनहरे कथनों में ही सीमित रह जाता है—लेकिन यहाँ उन्होंने इसे वास्तविकता में बदल दिया।
17 लाख रुपये का बीमित लोन, शत-प्रतिशत दिव्यांग पुत्र और पढ़ाई करती बेटी—साधारण शब्दों में “विकट जीवन” की तस्वीर है। आम तौर पर बैंक अपने नियम-कानून का हवाला देकर लोगों को परेशान करता है, लेकिन सवीन बंसल ने दिखा दिया कि अगर प्रशासन में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता हो, तो नियम सिर्फ कानूनी ढांचा नहीं बल्कि राहत देने का माध्यम बन सकते हैं। दस दिन तक निरंतर फॉलोअप, स्पष्ट समयसीमा देना और न होने पर कड़ी कार्रवाई की धमकी—यही वो नीतिगत कुशलता है जो केवल किताबों में नहीं, बल्कि जनकल्याण में जानी जाती है।
यहां व्यंग भी अपनी जगह है—कितने ही बैंक हैं, जो बीमा राशि होने के बावजूद लोगों को परेशान करने में माहिर हैं, लेकिन जब डीएम सवीन बंसल अपने हस्तक्षेप से “नो ड्यूज” दिलवाते हैं और कागजात लौटवाते हैं, तो यही व्यंग बन जाता है कि बैंक के लिए नियम बनाए गए थे, लेकिन जनता के लिए इंसानियत लागू होनी चाहिए।
सकारात्मक तंज यही है कि प्रशासन का सचमुच सक्रिय और न्यायप्रिय रूप देखने को मिला। शिक्षा, रोजगार, ऋणमाफी और संपत्ति वापसी—सवीन बंसल की कार्यशैली ने यह दिखा दिया कि समस्या चाहे कितनी भी विकट क्यों न हो, सही दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और दृढ़ता से हर मामले का समाधान संभव है।
अगर हर जिला ऐसा डीएम पाता, तो जनविश्वास सिर्फ बड़ता ही नहीं, बल्कि असहायों की मुस्कान हर घर में लौट आती। यही वह शासन है जो केवल कागजों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में अपना असर दिखाता है।








