
पहाड़ का मौसम कठिन, रास्ते टेढ़े-मेढ़े, बादलों से भरी धुंध, और दूर-दराज़ गांवों की ओर बढ़ता हुआ एक जिलाधिकारी। यह तस्वीर किताबों में नहीं, ज़मीनी हकीकत में है—और यह किरदार है सविन बंसल। ऐसे अफसर जिनकी परिभाषा सिर्फ “कुर्सी पर बैठने वाले अधिकारी” तक सीमित नहीं, बल्कि वे उस कुर्सी को उठाकर पहाड़ों की पगडंडियों पर ले जाते हैं।
आज के दौर में जब प्रशासन को अक्सर “फाइलों का ढेर और वातानुकूलित दफ्तर” समझा जाता है, तब सविन बंसल जैसे युवा डीएम, धामी सरकार की “जनता के द्वार” मुहिम को अपनी पीठ पर लेकर चल पड़ते हैं। उटैल-बैसोगिलानी जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्र, जहां प्रशासनिक अमला अक्सर “सड़क नहीं तो मुलाकात नहीं” के बहाने से कट जाता है, वहां सविन का पहुंचना ही जनता के लिए आधा समाधान हो जाता है।
व्यंग यही है कि पहाड़ों के लोग बरसों से “शिकायत दो, फाइल घूमेगी” की आदत के शिकार रहे हैं, लेकिन जब डीएम मौके पर ही आधे घंटे में ATR मांग ले, तो यह तंज व्यवस्था पर भी है और उम्मीद का नया दरवाजा भी। गरीब जौहर सिंह का 15 हज़ार का बिजली बिल माफ कर रायफल फंड से भुगतान करना—यह प्रशासनिक आदेश कम और मानवीय संवेदना ज़्यादा है।
अब इसे देखिए—एक ओर दिल्ली से लेकर देहरादून तक बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं, दूसरी ओर पहाड़ के गांव में बैठा किसान डीएम से कहता है कि “सड़क टूटी है” और वही डीएम मौके पर धन स्वीकृत कर देता है। यह प्रशासन का वह चहेरा है, जो कागजों में नहीं, जनता के आंगन में दिखाई देता है।
सकारात्मक तंज यही है कि अक्सर हम सुनते हैं “सरकार जनता के लिए है,” लेकिन यहां दृश्य उल्टा है—“जनता सरकार के लिए नहीं दौड़ रही, सरकार जनता के दरवाजे तक दौड़ रही है।” और इस दौड़ में सबसे आगे युवा तुर्क डीएम सविन बंसल हैं।
कूड़ा निस्तारण से लेकर आयुष्मान कार्ड, कृषि उपकरण से लेकर दिव्यांग पेंशन—यह सिर्फ शिविर नहीं था, यह व्यवस्था का लघु मॉडल था। 25 विभाग, 555 लोग लाभान्वित, शिकायतें सुनी गईं, समाधान मौके पर। यह वह ब्लॉकबस्टर प्रशासनिक पटकथा है, जो आमतौर पर फाइलों में लिखी जाती है, लेकिन इस बार इसे गांव वालों ने मंच पर जीया।
व्यंग्य यह भी है कि जहां एक ओर कई अफसर विकास की तस्वीरें खींचकर प्रेस विज्ञप्ति भेजने में व्यस्त रहते हैं, वहीं सविन बंसल जैसे डीएम तस्वीर नहीं, परिदृश्य बदलने में व्यस्त हैं।
कहा जाता है कि सदियों में कभी-कभी कोई ऐसा चेहरा आता है, जो व्यवस्था को आईना दिखाने के साथ-साथ जनता की आंखों में उम्मीद का दीया जलाता है। इस पहाड़ी शिविर ने यह साबित कर दिया कि सविन बंसल सिर्फ डीएम नहीं, बल्कि धामी सरकार का वह “युवा तुर्क” हैं, जिनकी जिम्मेदारी सिर्फ आदेश तक सीमित नहीं, बल्कि अंतिम छोर तक निभाई जाती है।
और अंत में, पहाड़ की जनता ने शायद पहली बार यह महसूस किया होगा कि “डीएम आया था,” यह वाक्य सिर्फ अखबार की सुर्खी नहीं, बल्कि गांव की चौपाल पर चर्चा का विषय बन गया। यही फर्क है उस प्रशासनिक चेहरे का, जो सदियों में कभी-कभी आता है।








