
जब डीएम सचमुच डीएम बने, तब कुछ इस तरह दिखता है – केवल चपरासी की नहीं, बल्कि परिवार के मनमुटाव की भी सुध लेने वाला। देहरादून में 70 वर्षीय बुजुर्ग दंपति ने अपने बेटे और उसकी पत्नी को घर से बेदखल करने का मामला सीधे डीएम के सामने रखा, और डीएम सविन बंसल ने जो किया, वह केवल प्रशासन नहीं, बल्कि मानवीय सूझबूझ की मिसाल है।
कहानी की शुरुआत होती है बुजुर्ग दंपति के नाराज होने से, जिन्होंने न्यायालय के चक्कर काटने की ठानी, क्योंकि बेटा-बहु, तीन नौनिहालों के साथ, उनके धैर्य की परीक्षा ले रहे थे। लेकिन डीएम ने दो सुनवाई में ही केस को समझ लिया और न केवल परिवार को टूटने से बचाया, बल्कि सभी को उनकी जिम्मेदारियों की याद भी दिलाई।
बचपन में जो स्कूलों में सिखाया जाता है – “घर में सबको मिलजुलकर रहना चाहिए”, यही डीएम ने दफ़्तर की कुर्सी से सीधे लागू कर दिया। बुजुर्गों को अपने बेटे बहु के प्रति कर्तव्य और बेटे-बहु को बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी याद दिलाई गई। साथ ही, निर्धन बेटे-बहु और तीन नौनिहाल बच्चों की भलाई के लिए भी प्रशासन ने हाथ आगे बढ़ाया।
अद्भुत बात यह है कि डीएम ने केवल आदेश नहीं दिए, बल्कि “प्रेरित किया” – सुनने में लगता है जैसे किसी ने परिवार को बैठाकर कहा, “भैया, बच्चों के लिए, और खुद के लिए भी, एक-दूसरे को निकालो मत।” बुजुर्ग दंपति और बेटे-बहु, दोनों को साथ रहने का अनुरोध किया गया और यह भरोसा दिलाया गया कि प्रशासन उनकी निगरानी रखेगा।
यहाँ आर्थिक स्थिति भी बड़ी भूमिका निभा रही थी – बेटे का कपड़े का छोटा व्यवसाय और निर्धन अवस्था, बच्चों की पढ़ाई, और बुजुर्गों का अकेलापन। डीएम ने इस पूरी तस्वीर को समझा और केवल कानून का पालन नहीं किया, बल्कि मानवता की अदालत में फैसला सुनाया।
सटीक विश्लेषण तो यही है – अगर डीएम ऐसे ही हो, तो न केवल कानून चलता है, बल्कि परिवार भी जुड़ा रहता है। भरणपोषण अधिनियम के जटिल कानूनी तर्क भी तब कम पड़ जाते हैं जब सामने हो प्रशासन की सूझबूझ और तंज में हल्का-सा व्यंग – “घर से निकालने की बजाय, साथ रहने की सलाह, और जिम्मेदारियों की याद!”
कहना पड़ेगा – डीएम हो तो ऐसा, जो केवल रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि रिश्तों पर भी फैसला करता है, और न्यायालय की औपचारिकता से पहले, इंसानियत की कुर्सी पर बैठकर परिवार को जोड़ता है। आखिरकार, कानून तो तभी जिंदा है जब परिवार टूटे नहीं और बच्चों की मुस्कान बरकरार रहे।








