
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शायद उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में हैं जो पत्रकारों को केवल “सूचना के माध्यम” के रूप में नहीं, बल्कि समाज के संवेदनशील धड़कन की तरह देखते हैं। उन्होंने उत्तरांचल प्रेस क्लब की भूमि आवंटन से लेकर भव्य भवन निर्माण तक की बात कही — पर बात सिर्फ भवन की नहीं, भावनाओं की है। ये वही भावनाएँ हैं जो पत्रकार अपनी कलम में लिए रोज़ सत्ता से सवाल करते हैं, जनता की आवाज़ बनते हैं, और कई बार अपने हितों की अनदेखी करके दूसरों के लिए लिखते हैं।
धामी का यह रुख ताजगी लाता है—जब अन्य राज्यों में पत्रकारों की कलम पर ताले लग रहे हैं, तब उत्तराखंड का मुख्यमंत्री उनके लिए दरवाज़े खोलने की बात कर रहा है। उन्होंने न केवल पेंशन बढ़ाई, बल्कि पत्रकार कल्याण कोष को भी दोगुना किया। यह कदम बताता है कि धामी सिर्फ फाइलों में नहीं, फिक्र में भी पत्रकारों के साथ हैं।
सकारात्मक व्यंग यही है कि जहाँ बाकी जगहों पर पत्रकारों की सुरक्षा “समिति” में फँसी रहती है, वहीं धामी उसे “संवेदनशीलता” में शामिल कर चुके हैं। वह जानते हैं कि लोकतंत्र की सांसें खबरों से चलती हैं—और अगर खबरों की आत्मा ही असुरक्षित हो जाए, तो सिस्टम का ऑक्सीजन खत्म हो जाता है।
मुख्यमंत्री ने यह समझ लिया है कि पत्रकार सिर्फ खबर नहीं लिखते, वो राज्य की दिशा तय करने वाली वह स्याही हैं जिससे भविष्य की पटकथा बनती है। ऐसे में, जब मुख्यमंत्री खुद उस स्याही का सम्मान करे, तो इसे सिर्फ नीति नहीं—संवेदनशील नेतृत्व कहा जाएगा। धामी का यह रुख बताता है कि वो सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पत्रकारों की भावनाओं को समझने वाले एक साथी हैं, जो जानते हैं कि कलम का सम्मान ही शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।








