
कभी-कभी दफ्तर की कुर्सी पर बैठा अफसर जब दिल से काम करने लगे तो “सरकारी सिस्टम” भी इंसानियत की आवाज़ सुनने लगता है। देहरादून में कुछ ऐसा ही कर दिखाया है डीएम सवीन बंसल ने। मां तक जब अपने बेटे के ख़िलाफ गुहार लेकर पहुँच जाएं, तो समझिए समाज का कितना धैर्य टूटा है — और जब उसी गुहार पर “गुंडा एक्ट” की कलम चल जाए, तो ये भी समझिए कि कोई डीएम वाक़ई नींद में नहीं, ज़मीर से काम कर रहा है।
किसी की एफआईआर मौके पर दर्ज हो रही है, किसी की पेंशन कल तक देने का आदेश निकल रहा है, तो किसी की छत पर बेतरतीब लगा टावर सीज़ हो रहा है — ये सब यूं ही नहीं होता। आम दिनों में तो सरकारी फाइलें धूप सेंकती रहती हैं, लेकिन जब ज़मीन पर बैठा अफसर लोगों के दुख सुनता है, तो वही फाइलें उड़ान भरने लगती हैं।
डीएम दरबार में जहां कभी लोग सिर्फ़ उम्मीद लेकर आते थे, अब वहां राहत लेकर लौट रहे हैं। बुजुर्ग राकेश तलवाड़ का अपनी ज़मीन वापस पाना और आशीर्वाद देना इस बात की गवाही है कि “जनदर्शन” अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि “जनमन” का विश्वास बन चुका है।
कभी-कभी लगता है, अगर हर जिले में सवीन बंसल जैसा कोई बैठा हो, तो सरकार को अलग से “जनसुनवाई अभियान” चलाने की ज़रूरत ही न पड़े। फर्क बस इतना है कि कुछ अफसर फाइलों से देश चलाते हैं, और कुछ – जैसे सवीन बंसल – लोगों के दिलों से।








