“जब सिस्टम ने दिखाया दिल — डीएम सविन बंसल ने फाइलों में इंसानियत, कानून में करुणा खोज ली”

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कभी-कभी लगता है कि “सरकारी तंत्र” भी अगर चाह ले, तो किसी की जिंदगी से बोझ हटाकर उसे फिर से मुस्कुराना सिखा सकता है। देहरादून की विधवा शोभा रावत की कहानी उसी दुर्लभ किस्म की मिसाल है, जब सरकारी दफ्तरों के कागज़ सिर्फ फाइलों में नहीं, किसी के दिल में हलचल मचा देते हैं।

आईसीआईसीआई बैंक की ठंडी फाइलों में दबे शोभा के घर के कागज़ जैसे “कर्ज़” के साथ कैद थे — और सिस्टम की खामोशी भी। लेकिन जब डीएम सविन बंसल ने उस चुप्पी को सुना, तो सरकारी गाड़ी की सायरन नहीं, इंसानियत की आवाज़ गूंजी। पाँच लाख के भारी बोझ को सिर्फ दस हज़ार में निपटवा कर बैंक को भी याद दिला दिया कि ‘नियम’ का मतलब ‘निर्दयता’ नहीं होता।

और यह सब किसी मंच से भाषण देकर नहीं, बल्कि एसडीएम न्याय कुमकुम जोशी जैसी अधिकारी की लगातार पैरवी से हुआ — जिन्होंने इस मामले को वैसे नहीं निपटाया जैसे फाइलें निपटाई जाती हैं, बल्कि जैसे कोई ज़िम्मेदारी निभाई जाती है।

शोभा के चेहरे पर लौटी मुस्कान अब सिर्फ एक व्यक्ति की राहत नहीं, बल्कि उस भरोसे की वापसी है जो आमतौर पर सरकारी गलियारों में खो जाता है। ये वही भरोसा है जो जनता हर बार वोट देते वक्त अपने भीतर जगाती है — और हर बार किसी न किसी फाइल में खो जाता है। लेकिन इस बार नहीं।

अब देखिए न, ये वही देश है जहाँ कभी “कर्ज़दार” की डायरी में “NPA” लिखा जाता था, और अब उसी के घर लौटे कागज़ों पर “नो ड्यूज़” लिखा है। फर्क सिर्फ इतना है — इस बार सिस्टम में एक डीएम था जो सुनता भी है, और एसडीएम थी जो मानती भी है कि सरकार तब तक सरकार नहीं, जब तक वो जनता के काम न आए।

और शायद यही वजह है कि शोभा जैसे लोगों की दुआएँ अब किसी चुनावी घोषणा पत्र में नहीं, बल्कि दफ्तर की रजिस्ट्री में दर्ज हो रही हैं।

कहने को तो ये “एक केस निपटा” है, लेकिन असल में ये एक भरोसे की वापसी है — कि अगर अधिकारी चाह लें, तो सरकार “सिस्टम” नहीं, सहारा बन सकती है।

डीएम हो तो ऐसा — जो फाइलों में इंसान खोज ले, और कानून में करुणा।

Khushi
Author: Khushi

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