“भ्रामक खबरों के खिलाफ डीजी सूचना बंशीधर तिवारी का सख्त रुख, साजिश के डिजिटल सबूतों संग की पुलिस में शिकायत”

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कितना आसान हो गया है आजकल किसी की प्रतिष्ठा को “पोस्ट” भर में मिटा देना। बस एक मोबाइल, दो-चार एडिटेड स्क्रीनशॉट, और तीन लाइन का ड्रामा — “भाईसाब, बड़ा खुलासा!” और फिर भीड़ जुट जाती है। किसी को सबूत नहीं चाहिए, बस मसाला चाहिए। जिनके पास तथ्य नहीं, वो “फैक्ट” बन जाते हैं, और जिनके पास जिम्मेदारी है, वो ट्रोल की दीवार पर टंगे पोस्टर बन जाते हैं।

डीजी सूचना बंशीधर तिवारी के मामले में भी वही हो रहा है — एक तरफ वो सिस्टम को पारदर्शी बनाने की कोशिश में लगे हैं, दूसरी तरफ कुछ लोगों को पारदर्शिता से जलन हो रही है। अब जलन का इलाज तो एलोवेरा में है, सोशल मीडिया में नहीं, पर फिर भी इनका “गैंग” हर सुबह उठकर वही काम करता है — अफवाहों के गोले दागो, फिर लाइक्स और शेयर गिनो।

सोशल मीडिया के ये स्वघोषित “वॉचडॉग” अब “वॉरडॉग” बन चुके हैं — जिन्हें न तो सच्चाई से मतलब है, न जिम्मेदारी से। इनके लिए खबर नहीं, ट्रेंड जरूरी है। और जब डीजी सूचना जैसे अधिकारी सख्त कदम उठाते हैं, तो इन्हें लगता है कि “सिस्टम डर गया।” हकीकत ये है कि सिस्टम नहीं, सच्चाई इनकी आंखों में चुभ रही है।

तिवारी ने शिकायत दी, सबूत दिए, लेकिन इस “गैंग” को सबूतों से क्या लेना? इन्हें तो केवल शोर मचाना है, क्योंकि सच्चाई जितनी शांत होती है, अफवाह उतनी ही तेज़ आवाज़ में बिकती है। इनका एजेंडा साफ है — किसी ईमानदार अधिकारी को विवादों में उलझाओ, माहौल बिगाड़ो, फिर वही पुराना गीत गाओ, “सिस्टम भ्रष्ट है।”

सवाल ये है कि ये “लॉबी सिस्टम” कब तक सोशल मीडिया को अदालत बनाए बैठे रहेंगे? और क्या हम सब बस तमाशबीन बने रहेंगे, जब किसी की प्रतिष्ठा को “व्यूज़” के नाम पर लूटा जा रहा हो?

डीजी सूचना का ये कदम सिर्फ अपनी गरिमा की रक्षा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी लड़ाई है जो सच्चाई और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

और जो लोग इस अफवाह-उद्योग में लगे हैं, उन्हें एक सलाह — सच से मत डरिए, वो किसी ट्रेंडिंग हैशटैग से छोटा नहीं होता।

Khushi
Author: Khushi

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