
देहरादून की फिज़ा में इन दिनों एक अदृश्य जंग चल रही है — जंग सूचना की, साख की और सच्चाई की।
और इस जंग के केंद्र में हैं उत्तराखंड के डीजी सूचना बंशीधर तिवारी — वो अधिकारी जिनका नाम पारदर्शिता, सख़्ती और व्यवस्था की मर्यादा के साथ जुड़ा है।
लेकिन जब सच्चाई की आवाज़ ऊँची होती है, तो झूठ बेचने वालों के कान फटते हैं।
अब कुछ विदेशी आईडी, चीन-वियतनाम की प्रोफाइलें, और उनके देसी साझेदार — एक साथ “डिजिटल मिशन” पर निकल पड़े हैं।
लक्ष्य साफ है: सरकार और तिवारी की छवि को बिगाड़ो, जनता में भ्रम फैलाओ, और अफसरशाही पर कीचड़ उछालकर राजनीतिक लाभ उठाओ।
पर जिस तिवारी ने सूचना तंत्र को जनता की बात सुनने और सरकार की नीतियों को सटीक तरीके से जनता तक पहुँचाने का माध्यम बनाया —
वो अब कुछ कीबोर्ड योद्धाओं के निशाने पर है, जिनकी औकात फेक प्रोफाइल से ज़्यादा कुछ नहीं।
बंशीधर तिवारी ने कोई “प्रेस कॉन्फ्रेंस” नहीं की, कोई बयानबाज़ी नहीं की —
उन्होंने कानूनी रास्ता चुना। सीधे एसएसपी देहरादून को तहरीर दी, स्क्रीनशॉट सबूत के तौर पर सौंपे, और कहा —
“जांच कीजिए, ताकि सच और झूठ का फर्क सबको साफ दिखे।”
यही एक सच्चे प्रशासनिक अधिकारी की पहचान होती है — तथ्य से जवाब देना, तंज से नहीं।
अब बात उन विदेशी एजेंटों और उनके देसी हमदर्दों की।
आख़िर इन फेक प्रोफाइलों को उत्तराखंड की राजनीति और अफसरशाही से इतना प्रेम क्यों हो गया है?
क्यों हर बार जब कोई सख़्त अफसर अपनी जगह पर डटा होता है, तभी अचानक “जनता के नाम पर” झूठी पोस्टें फैलने लगती हैं?
क्या ये वही डिजिटल माओवादी नहीं जो “अभिव्यक्ति की आज़ादी” की आड़ में सरकारी संस्थाओं में अविश्वास बोते हैं?
तिवारी पर हमला दरअसल ईमानदारी पर हमला है।
क्योंकि जब सिस्टम के भीतर का एक आदमी साफ तरीके से काम करता है, तो भ्रष्टों की सांसें फूली रहती हैं।
ये वही लोग हैं जो न खुद काम करना चाहते हैं, न किसी और को करने देना।
जिन्हें पद नहीं मिला, वो पोस्ट बना लेते हैं; जिनका नाम नहीं बना, वो बदनाम करने निकल पड़ते हैं।
सवाल अब सरकार के सामने है —
क्या ऐसे विदेशी एजेंडा चलाने वालों की पहचान और फंडिंग की CBI जांच नहीं होनी चाहिए?
क्योंकि यह सिर्फ एक अफसर की छवि का मामला नहीं, यह राज्य की सूचना व्यवस्था की सुरक्षा का सवाल है।
बंशीधर तिवारी ने यह साबित किया है कि
ईमानदारी को बदनाम किया जा सकता है, पर हराया नहीं जा सकता।
वो अफसर हैं जो विवाद में नहीं, काम में विश्वास रखते हैं।
आज जरूरत है कि सिस्टम ऐसे अफसरों के साथ खड़ा हो —
क्योंकि जब “तिवारी जैसे” लोग झुकेंगे, तब सच की रीढ़ टूट जाएगी।
उत्तराखंड को इस वक्त झूठ नहीं, साहस और सच्चाई की जरूरत है।
और उस सच्चाई का नाम है — बंशीधर तिवारी: जो सब पर भारी।








