“दीप जलाना आसान है, पर राम की मर्यादा निभाना कठिन — असली दीपावली भीतर के अंधकार को मिटाने का पर्व है”

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दीपावली सिर्फ रोशनी और आतिशबाज़ी का त्यौहार नहीं है, यह आत्मा के भीतर के अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। यह वह दिन है जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास और असत्य, अन्याय, अहंकार पर विजय के बाद अयोध्या लौटे थे। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या आज के समाज में राम लौटे हैं? या हमने अपने भीतर की अयोध्या को ही धूल में दबा दिया है?

रामायण हमें सिर्फ कहानी नहीं, जीवन का दर्शन देती है। श्रीराम ने मर्यादा का पालन किया — पुत्र धर्म, भ्रातृ धर्म, पति धर्म, राजा धर्म — हर रूप में उन्होंने स्वयं को सीमाओं में रखा। आज के समय में जब युवा पीढ़ी ‘स्वतंत्रता’ को ‘स्वेच्छाचारिता’ समझ बैठी है, तब राम का यह पाठ सबसे प्रासंगिक है। मर्यादा का अर्थ बंधन नहीं, बल्कि आत्मसंयम है — जो व्यक्ति स्वयं को सीमित कर सकता है, वही असली स्वतंत्र है।

आज दीपावली के दीप केवल दीवारों पर जगमगा रहे हैं, लेकिन मन में अंधकार है — ईर्ष्या, क्रोध, दिखावा और लालच का। राम ने वनवास में भी वैराग्य नहीं, संयम चुना। उन्होंने राजपाट छोड़ा लेकिन अपने आदर्श नहीं। आज जब समाज ‘लाइक’ और ‘फॉलोअर्स’ के पीछे भाग रहा है, तब हमें राम की तरह आत्म-नियंत्रण की लौ जलानी होगी।

दीपावली का संदेश है — अंधकार चाहे जितना गहरा क्यों न हो, एक छोटा दीपक भी उसे मिटा सकता है। वह दीपक हमारी चेतना है, हमारा विवेक है, हमारी मर्यादा है। युवा पीढ़ी अगर इस दीप को अपने भीतर जलाना सीख ले, तो हर घर अयोध्या बन सकता है, हर हृदय रामधनु बन सकता है।

राम का जीवन बताता है कि विजय का असली अर्थ युद्ध जीतना नहीं, स्वयं पर विजय पाना है। यही दीपावली का सार है — स्वयं के भीतर झाँकना, अपने भीतर के रावण को पहचानना, और उसे दीप की लौ में जलाकर राख कर देना। तभी असली दीपावली होगी, तभी लौटेगी मर्यादा, तभी लौटेंगे राम — हमारे भीतर।

Khushi
Author: Khushi

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