

दिल्ली के इंदिरा भवन में आज उत्तराखंड कांग्रेस का एक ऐसा जमावड़ा देखने को मिला जो आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। बैठक में प्रदेश कांग्रेस के सभी वरिष्ठ चेहरे मौजूद थे — आदरणीय हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करण माहरा, राष्ट्रीय महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा और सह प्रभारी सुरेंद्र शर्मा। चेहरों की यह सूची किसी औपचारिक बैठक की तरह जरूर लगती है, लेकिन इसके भीतर बहुत कुछ अनकहा और संकेतों से भरा हुआ था।
इस पूरे परिदृश्य में दो शख्सियतें सबसे ज़्यादा चर्चा में रहीं — एक ओर यशपाल आर्य, जिन्होंने अपने अनुभव, संतुलित स्वभाव और राजनीतिक परिपक्वता से बैठक का केंद्र संभाला; दूसरी ओर राजीव महर्षि, जो इस समय प्रदेश कांग्रेस के मीडिया चेयरमैन के रूप में संगठन के सबसे सक्रिय और रणनीतिक दिमाग माने जा रहे हैं।
यशपाल आर्य का आज का वक्तव्य न सिर्फ संगठन के भीतर अनुशासन का संदेश देता है, बल्कि यह भी साफ़ करता है कि कांग्रेस अब 2027 की तैयारी “सोच-समझ कर, एक टीम के रूप में” करना चाहती है। आर्य ने मीडिया के समक्ष जो बातें रखीं, उनमें संगठन की मजबूती, जनता से जुड़ाव और उत्तराखंड की जमीनी समस्याओं को लेकर नई रणनीति के संकेत स्पष्ट झलके। उनके अनुभव ने यह महसूस कराया कि वे केवल विपक्ष के नेता नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाले गंभीर मार्गदर्शक की भूमिका में हैं।
वहीं दूसरी तरफ राजीव महर्षि की उपस्थिति ने इस बैठक को एक अलग धार दी। महर्षि लगातार कांग्रेस के मीडिया नैरेटिव को सशक्त करने में लगे हैं। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ सरकार की छवि और विपक्ष की आवाज़ में लगातार टकराव रहता है, वहाँ महर्षि का संवाद कौशल कांग्रेस के लिए बड़ी पूँजी बनता जा रहा है। वे सिर्फ प्रवक्ता नहीं, बल्कि संगठन के भीतर एक रणनीतिक संचार केंद्र की तरह कार्य कर रहे हैं। दिल्ली की इस बैठक में उनकी भूमिका एक बार फिर साफ़ कर गई कि पार्टी अब मीडिया प्रबंधन को सिर्फ “बयान जारी करने” तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि इसे जनसंवाद के हथियार की तरह इस्तेमाल करेगी।
हरीश रावत अपनी सियासी समझ और अनुभवी नेतृत्व के साथ उपस्थित थे, मगर इस बार उनका अंदाज़ अपेक्षाकृत संयमित रहा। संभवतः उन्होंने खुद को “सल्लाहकार की भूमिका” में रखकर युवा और सक्रिय चेहरों को आगे आने का अवसर देने की रणनीति चुनी है। प्रीतम सिंह और करण माहरा संगठनात्मक मजबूती पर केंद्रित दिखे — माहरा ने बैठक में प्रदेश स्तर पर समन्वय और बूथ स्तर पर संरचना को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया।
कुमारी शैलजा और के.सी. वेणुगोपाल की मौजूदगी यह दर्शाती है कि आलाकमान अब उत्तराखंड को “प्राथमिकता वाले राज्यों” में गिन रहा है। दोनों नेताओं ने संगठनात्मक अनुशासन, एकजुटता और दिल्ली-देहरादून के बीच तालमेल को मज़बूत करने का संदेश दिया।
लेकिन कुल मिलाकर, यह बैठक एक संकेत छोड़ गई — कांग्रेस अब उत्तराखंड में “आत्ममंथन” से आगे बढ़कर “रणनीतिक पुनर्गठन” के मोड में आ चुकी है। जहां अनुभव की नब्ज़ यशपाल आर्य के पास है, वहीं संचार की दिशा और जनता तक पहुँच का ज़रिया राजीव महर्षि जैसे आधुनिक सोच वाले नेता सँभाल रहे हैं।
बैठक खत्म होने के बाद मीडिया गलियारे में जो सबसे ज़्यादा चर्चा रही, वह यही थी कि कांग्रेस अब उत्तराखंड में चेहरे नहीं, चरित्र गढ़ने की तैयारी में है। और उस नए चरित्र की रूपरेखा शायद आज इंदिरा भवन की इस बैठक में ही लिखी जाने लगी है।








