

कभी-कभी प्रशासन अगर वाकई “प्रशासन” बन जाए, तो जाम भी हार मान लेता है। देहरादून में ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला जब जिलाधिकारी सविन बंसल ने एक ऐसा आदेश दिया, जिसने न सिर्फ सड़कों को राहत दी बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सही फैसले वक्त पर लिए जाएं तो व्यवस्था दम तोड़ती नहीं — सांस लेती है।
उत्तराखंड रजत जयंती के मौके पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देहरादून पहुंचे, तब सबको यही डर था कि राजधानी सड़कों से ज्यादा ‘जाम’ के लिए खबरों में न आ जाए। लेकिन नहीं — इस बार प्रशासन ने ट्रैफिक की नब्ज़ पकड़ ली। डीएम बंसल ने आदेश दिया कि लच्छीवाला टोल प्लाजा और एक्सप्रेसवे को सुबह 5 बजे से शाम 6 बजे तक निशुल्क रखा जाएगा। यानी बिना रुके, बिना टिके, वाहनों को खुला रास्ता — और शहर को खुली हवा।
नतीजा क्या हुआ? न horns का शोर, न stuck गाड़ियों की कतार। देहरादून ने एक दिन के लिए राहत की सांस ली। टोल प्लाजा पर ‘फास्ट टैग’ की मशीनें भी शायद पहली बार इत्मीनान से झपकी ले पाईं।
डीएम बंसल का यह कदम सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, बल्कि यह एक संदेश भी था — कि “जिम्मेदारी अगर चाहो तो बोझ नहीं, व्यवस्था बन सकती है।” प्रधानमंत्री की रैली के बीच शहर का ट्रैफिक संभालना वैसे भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता, मगर बंसल ने यह साबित कर दिया कि जब नेतृत्व सजग हो, तो भीड़ भी अनुशासित लगने लगती है।
अब सवाल यह नहीं कि शहर जाम से बच गया, सवाल यह है कि बाकी जिलों के डीएम कब “बंसल क्लास” में दाखिला लेंगे? क्योंकि सटीक रणनीति, सख्त अमल और जनसहज सोच का यह मिश्रण वाकई “गुड गवर्नेंस” की असली परिभाषा है।
कह सकते हैं — धामी सरकार के “धामी मॉडल” के बीच, देहरादून में एक नया “बंसल मॉडल” जन्म ले चुका है — जहाँ आदेश सिर्फ फाइल में नहीं, ज़मीन पर असर दिखाता है।








