
रजत जयंती समारोह के बहाने देहरादून ने प्रशासनिक दक्षता की जो तस्वीर देखी, वह किसी मॉडल फाइल से नहीं, मैदान से लिखी गई थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की तेज़ रफ़्तार सोच और एसएसपी अजय सिंह की फौलादी रणनीति—इन दोनों की जोड़ी ने यह दिखा दिया कि अगर सिस्टम में साफ नीयत और सख़्त नीति हो, तो भीड़ भी अनुशासन सीख जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा, डेढ़ लाख की भीड़, हर मोड़ पर सुरक्षा और समय की पाबंदी—यह सब केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं थी, बल्कि एक इम्तिहान था कि उत्तराखंड की राजधानी कितनी तैयार है। जवाब था—पूरी तरह तैयार।
मुख्यमंत्री धामी ने ऊपर से नेतृत्व किया और नीचे एसएसपी अजय सिंह ने मोर्चा संभाला। न कोई जाम, न कोई भगदड़, न कोई सुरक्षा चूक। देहरादून की सड़कों पर व्यवस्था यूं बह रही थी, जैसे किसी ने ट्रैफिक सिग्नल नहीं, समय की नसें पकड़ रखी हों।
तेज़तर्रार आईपीएस अजय सिंह ने फिर साबित किया कि वर्दी केवल अधिकार नहीं, अनुशासन की जिम्मेदारी भी है। जब बाकी अफसर ‘प्रोटोकॉल’ में व्यस्त थे, अजय सिंह खुद फील्ड में थे। हर नाके पर ब्रीफिंग, हर रास्ते पर नज़र, हर सिपाही में जोश—यह वही स्टाइल है जो किताबों में नहीं, कमान में नजर आती है।
मुख्यमंत्री धामी की प्रशासनिक साख इस आयोजन से और मज़बूत हुई। क्योंकि जब कप्तान अजय सिंह जैसा हो, तो सीएम को केवल दिशा देनी होती है, दिशा-निर्देश नहीं। यह वही समन्वय है जिसने रजत जयंती को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक उपलब्धि बना दिया।
देहरादून ने देखा कि जब धामी की राजनीतिक दूरदर्शिता और अजय सिंह की रणनीतिक क्षमता साथ चलती है, तो भीड़ में भी अनुशासन और व्यवस्था में भी संवेदनशीलता दिखाई देती है।
बाकी अफसरों के लिए यह एक सबक है—कुर्सी बड़ी नहीं होती, कमान का हौसला बड़ा होता है।
रजत जयंती का यह आयोजन केवल पीएम मोदी की यात्रा नहीं थी, बल्कि एक संकेत था कि उत्तराखंड अब तेज़ी से आगे बढ़ रहा है—जहां नेतृत्व धामी जैसा और कप्तान अजय सिंह जैसा हो, वहां न तो योजना डगमगाती है, न भीड़।








