
देहरादून में अवैध निर्माणों पर चल रहा एमडीडीए का डंडा इस समय शहर के हर उस कोने में सुना जा रहा है, जहां वर्षों से नियमों को खिलौना समझकर प्लॉट काटे जाते थे। लोगों की आदत हो गई थी कि दो लाइनें खींचकर जमीन को “इंक्लेव” घोषित कर दिया जाए और कुछ खंभे खड़े कर जिन्दगी का नया नक्शा बेच दिया जाए। लेकिन अब हालात बदले हैं—और यह बदलाव किसी घोषणा पत्र में नहीं, सीधे जेसीबी की गरज में दिख रहा है।
बंशीधर तिवारी का अंदाज़ भी कम दिलचस्प नहीं है। वे उन अधिकारियों में से नहीं जो फाइल देखकर बस “समीक्षा” कर दें। उनका तरीका अलग है—जो गलत करेगा, वह ढहेगा… और ढहेगा भी बिना पूर्व सूचना वाले बहानों के। आज शिमला बाईपास पर ध्वस्तीकरण ने साबित कर दिया कि अवैध निर्माण करने वालों के “हम देख लेंगे” और “सब सेट हो जाएगा” वाले जमाने को उन्होंने सीधे मशीन की आवाज़ से चुप करा दिया है।
दरअसल, देहरादून में कुछ लोगों ने नियमों को इतनी हल्की चीज समझ लिया था कि जैसे बारिश में भीगने पर सुख जाने वाली टी-शर्ट हो। जहां मन आया वहीं प्लॉट काट दिया, जहां याद आया वहीं दुकान खड़ी कर ली, यह सोचकर कि “कौन रोकेगा?”
लेकिन आज की कार्रवाई ने बता दिया कि रोकने वाला मौजूद है—और पूरी तरह जागा हुआ है।
तिवारी का सख्त रुख उन लोगों के लिए बड़ा झटका है जो शहर को अपनी निजी प्रॉपर्टी समझते हुए अनियमित विकास के नाम पर खुलेआम हेराफेरी करते थे। अब साफ संदेश है—
देहरादून में विकास वही करेगा, जिसे नियम पढ़ना आता है। बाकी के लिए ध्वस्तीकरण की भाषा पहले ही तैयार है।
सच कहें तो शहर को पहली बार ऐसा अधिकारी मिला है जिसने अवैध निर्माण करने वालों को आइना दिखा दिया। और यह आइना कांच का नहीं, ईंटों और मशीनों की आवाज़ में बना है।
अगर यह तेज रफ्तार ऐसे ही जारी रही, तो देहरादून का भविष्य सिर्फ सुंदर नहीं, बल्कि अनुशासित भी होगा—
और उन लोगों के लिए बेहद असहज, जो अब तक कानून को अपनी जेब में रखते थे।








