धामी के निरीक्षण पर तिवारी का तेज़ एक्शन, आईएसबीटी को मॉडल स्टेशन बनाने की मुहिम तेज

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देहरादून के आईएसबीटी में हाल ही में जो कुछ हुआ, उसने एक बात साफ कर दी—जब मजबूत और अलर्ट अधिकारी मैदान में उतरते हैं, तो हालात बदलने में समय नहीं लगता। मुख्यमंत्री धामी के औचक निरीक्षण ने जैसे ही संकेत दिया कि व्यवस्था में ढीलापन है, उसी पल एमडीडीए उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी एक्शन मोड में आ गए। तिवारी की यही खासियत है—मुद्दा उठते ही वे फाइल पलटकर देखने वालों में नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर काम शुरू करने वालों में गिने जाते हैं।

तिवारी ने पूरे आईएसबीटी की सफाई व्यवस्था को लेकर बैठक की, जिम्मेदारियां तय कीं और एक बात बहुत स्पष्ट कर दी: “आईएसबीटी में सफाई भी होगी और लापरवाही भी बर्दाश्त नहीं होगी।” यह वही सख्त तेवर हैं जो अक्सर सरकारी तंत्र में देखने को मिलते नहीं, लेकिन जब दिखते हैं तो फर्क जमीन पर नजर आने लगता है। उनके निर्देश पर सिर्फ सफाई की औपचारिक तस्वीरें नहीं खिंचीं, बल्कि पूरा परिसर—from प्लेटफॉर्म से लेकर मुख्य मार्ग तक—वास्तव में साफ किया गया।

स्वच्छता अभियान में कर्मचारियों की व्यापक मौजूदगी यह बताती है कि तिवारी ने अपने टीम को सिर्फ निर्देश नहीं दिए, बल्कि प्रेरित भी किया। बस चालकों और कंडक्टरों को पॉलिथीन बैग देकर यह समझाना कि कचरा खुले में न डालें—यह छोटे कदम हैं, लेकिन इन्हीं छोटे कदमों से बड़ी तस्वीर बदलती है। और यही तिवारी की प्रशासनिक शैली है—छोटी चीज़ों को भी गंभीरता से लेना, क्योंकि स्वच्छता और व्यवस्था जमीन से ही शुरू होती है, भाषणों से नहीं।

हर बुधवार सघन अभियान चलाने का निर्णय भी उनके उस व्यावहारिक सोच का हिस्सा है, जिसमें निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है। यह घोषणा नहीं, बल्कि स्थायी अनुशासन की व्यवस्था है। ऐसा लगता है कि तिवारी का मानना है कि सफाई एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि हर हफ्ते की आदत होनी चाहिए—और यही आदत आईएसबीटी को मॉडल बनाएगी।

हालांकि इस पूरे प्रयास में तंज का पहलू भी है। हमारा सिस्टम अक्सर तभी सुधरता है जब कोई अधिकारी उसकी धूल झाड़ने में लग जाए। लेकिन सकारात्मक तंज यही है कि इस बार धूल इसलिए नहीं हटी कि मीडिया ने शोर मचाया, बल्कि इसलिए कि बंशीधर तिवारी जैसे अधिकारी वास्तव में जागते नहीं, बल्कि पहले से ही जागे रहते हैं। निरीक्षण की खबर आते ही जो तेज़ी उन्होंने दिखाई, वह बताती है कि उन्होंने प्रशासन को सिर्फ कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी की तरह लिया है।

कुल मिलाकर, आईएसबीटी में चल रहा यह अभियान सिर्फ सफाई का नहीं बल्कि प्रशासनिक सक्रियता का उदाहरण है। तिवारी की भूमिका यह दिखाती है कि जब अधिकारी मजबूत, अलर्ट और निष्पक्ष नजरिये से काम करते हैं, तो शहर का चेहरा बदलना कोई कठिन काम नहीं। देहरादून के आईएसबीटी का सुधरना तय है—क्योंकि steering अब ऐसे हाथों में है, जो ब्रेक भी जानते हैं और एक्सेलरेटर कब दबाना है, यह भी।

Khushi
Author: Khushi

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