डीएम हो तो सविन बंसल जैसा—औचक निरीक्षण ने महकमे को जगा दिया, व्यवस्थाओं में जान फूंक दी

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देहरादून में प्रशासन चलाना हो तो डीएम हो तो सविन बंसल जैसा हो — जो औचक निरीक्षण भी ऐसे करें कि आधा महकमा जाग जाए और बाकी आधा काम पर लग जाए। केदापुरम पहुंचे तो नारी निकेतन से लेकर शिशु सदन तक हर व्यवस्था को ऐसे परखा जैसे किसी परीक्षा में कॉपियां जांची जा रही हों। और जाहिर है—जहां कमी दिखी, वहां आदेश उसी वक्त।

सुरक्षा कमजोर दिखी तो दो महिला होमगार्ड की तैनाती तुरंत। स्वास्थ्य सेवाएं ढीली लगीं तो दो नर्सें और लगाने के निर्देश। बच्चों के स्वास्थ्य पर फोकस इतना कि आरबीएसके टीम को कहा—“भाई, विजिट सिर्फ कागज़ों में नहीं, जमीन पर भी दिखनी चाहिए।”

सर्दी बढ़ रही है, तो डीएम खुद स्वेटर–टोपी बांटते दिखे। प्रशासनिक सख्ती के साथ मानवीय संवेदना का यह कॉम्बो कुछ लोगों को चुभ भी जाता है, लेकिन जनता तो खुश दिखी—कम से कम यहां बातें नहीं, काम हो रहा है।

कुछ अधिकारी तो आज भी सोच रहे होंगे कि मोबाइल और सिम की स्वीकृति इतनी आसानी से कैसे दे दी—क्योंकि आमतौर पर फाइलें मंज़िल पर पहुंचते-पहुंचते बूढ़ी हो जाती हैं। लेकिन यहां 11 मोबाइल और सिम ऑन-द-स्पॉट पास। यही स्टाइल भरोसा दिलाती है कि डीएम की कुर्सी कोई शोपीस नहीं, वर्कस्टेशन है।

बालिका निकेतन में खेलकूद की सुविधाएं बढ़ाने का आदेश भी आया—खो-खो, कबड्डी, बैडमिंटन, योग… यानी बालिकाएं अब सिर्फ सीमित दायरे में नहीं, मैदान में भी उड़ान भरेंगी। शिशु सदन में ऑयल हीटर लगवाने का निर्देश—यानी सर्दी नहीं, संवेदना गर्म होनी चाहिए।

और हां, निर्माणकार्य की धीमी गति पर भी डीएम की नजर रही। साफ संदेश—“काम जल्दी करो, वरना मैं फिर आ जाऊंगा।” अब विभाग समझ चुका है कि इस डीएम के सामने देरी का बहाना नहीं चलता।

कुल मिलाकर, नारी निकेतन, बालिका निकेतन और शिशु सदन का आज का निरीक्षण सिर्फ औपचारिकता नहीं था, बल्कि इस बात का एेलान था कि बेसहारा महिलाओं और बच्चों की जिंदगी में सुधार ‘मीटिंगों’ से नहीं, मैदान में उतरकर होता है। और यह भी कि डीएम हो तो सविन बंसल जैसा—जो फाइलों से ज्यादा लोगों को पढ़ना जानते हैं।



Khushi
Author: Khushi

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