
त्यागी भूमिहार ब्राह्मण समाज द्वारा परशुराम भवन का भूमिपूजन सिर्फ एक धार्मिक-सामाजिक आयोजन नहीं है, यह उस लंबे संघर्ष और उपेक्षा का जवाब है जिसे समाज वर्षों से झेलता आ रहा था। यह भूमिपूजन समाज के लिए “मील का पत्थर” इसलिए है क्योंकि यह भवन ईंट-सीमेंट से ज्यादा, पहचान, एकजुटता और आत्मसम्मान की नींव है।
इस पूरी पहल के केंद्र में एक नाम साफ उभरकर आता है—माँगेराम त्यागी। आज जब राजनीति में समाज को सिर्फ चुनावी गणित के तौर पर देखा जाता है, ऐसे समय में माँगेराम त्यागी का यह कदम कई तथाकथित राजनीतिक पंडितों के लिए असहज करने वाला है। वजह साफ है—जो काम बड़े मंच, बड़े दल और बड़े दावों के साथ नहीं हो पाया, वह एक जमीन से जुड़े व्यक्ति ने कर दिखाया।
माँगेराम त्यागी की ताकत किसी पद, सत्ता या संगठन के कागजी दायरे में नहीं, बल्कि समाज के साथ उनकी निरंतर मौजूदगी में है। समाज के सुख-दुख में खड़ा रहना उनके लिए नारा नहीं, दिनचर्या है। दिन हो या रात, किसी परिवार पर संकट हो या समाज के सम्मान का सवाल—माँगेराम त्यागी हर मोर्चे पर दिखाई देते हैं। यही वजह है कि परशुराम भवन का भूमिपूजन सिर्फ उनका व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति बन गया।
यह कदम उन नेताओं और दलों के लिए भी एक आईना है जो मंचों से समाज के नाम पर भाषण देते हैं, लेकिन जमीन पर समाज के लिए कुछ ठोस करने से कतराते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे में कई राजनीतिक ठेकेदारों के पेट में मरोड़ होगी—कि “माँगेराम ने ऐसे कैसे कर दिया?” क्योंकि यह काम उनके दावों की पोल खोलता है।
परशुराम भवन आने वाले समय में सिर्फ एक भवन नहीं रहेगा, यह समाज की बैठकों, विचारों, संघर्षों और निर्णयों का केंद्र बनेगा। यहीं से समाज की नई पीढ़ी अपनी पहचान और दिशा तय करेगी। और जब इतिहास इस दौर को देखेगा, तो यह साफ दर्ज होगा कि जब समाज को किसी सच्चे साथी की जरूरत थी, तब माँगेराम त्यागी चुपचाप नहीं बैठे—बल्कि खड़े हुए, डटे रहे और करके दिखाया।
त्यागी समाज में आज बहुत लोग हैं, पर हर समय समाज के साथ खड़े रहने वाले बहुत कम। माँगेराम त्यागी उन गिने-चुने लोगों में नहीं, बल्कि शायद एकमात्र ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरते हैं, जिनकी मौजूदगी सिर्फ भाषणों में नहीं, हर मुश्किल घड़ी में महसूस होती है। यही वजह है कि यह भूमिपूजन सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समाज की दिशा बदलने वाला क्षण है।








