अमित शाह से भेंट के जरिए संवाद की राजनीति, केंद्र के साथ तालमेल से विकास को धार देती ऋतु खंडूरी

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उत्तराखंड जैसे सीमांत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य के लिए केंद्र से मजबूत संवाद केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विकास की अनिवार्यता है। इस कसौटी पर देखें तो विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी भूषण का केंद्र सरकार के साथ सतत और संतुलित तालमेल कोई संयोग नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक समझ और दीर्घकालिक सोच का परिणाम दिखाई देता है।

ऋतु खंडूरी उन चुनिंदा नेताओं में हैं जो “दिल्ली की दूरी” को बयानबाज़ी का विषय नहीं, बल्कि संवाद का सेतु मानती हैं। समय-समय पर केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात, वह भी केवल फोटो फ्रेम तक सीमित नहीं, बल्कि विषयवस्तु के साथ—चाहे वह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत हो, कोटद्वार का समग्र विकास हो या राज्य की संस्थागत आवश्यकताएँ। यही वह बारीक फर्क है जो सक्रिय भूमिका और प्रतीकात्मक भूमिका के बीच रेखा खींचता है।

सकारात्मक तंज यही है कि जब कुछ नेता केंद्र को दोष देने में अपनी ऊर्जा खर्च करते हैं, तब ऋतु खंडूरी केंद्र को जोड़ने में अपनी राजनीतिक पूंजी लगाती हैं। परिणाम यह कि राज्य का पक्ष “शिकायतकर्ता” की तरह नहीं, बल्कि “सहभागी” की तरह रखा जाता है। यह वही परिपक्वता है जो आज की राजनीति में अक्सर भाषणों में मिलती है, व्यवहार में कम।

यूनेस्को मान्यता प्राप्त “रम्माण” जैसे लोकनाट्य को राष्ट्रीय नेतृत्व तक ले जाना केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि यह संदेश है कि विकास का मतलब सिर्फ सड़क और पुल नहीं होता, पहचान और आत्मा का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। केंद्र के साथ इस तरह का संवाद यह दिखाता है कि उत्तराखंड को केवल फाइलों में नहीं, बल्कि भावना और विचार के स्तर पर भी रखा जा रहा है।

विधानसभा अध्यक्ष का पद संवैधानिक रूप से तटस्थ माना जाता है, लेकिन ऋतु खंडूरी ने यह स्पष्ट किया है कि तटस्थता का अर्थ निष्क्रियता नहीं होता। विकास, संस्कृति और राज्यहित के मुद्दों पर केंद्र से संवाद करना किसी एजेंडे की राजनीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की राजनीति है। और शायद यही कारण है कि उनकी उपस्थिति दिल्ली में “औपचारिक भेंट” से आगे जाकर “कार्यात्मक संपर्क” बनती दिखती है।

व्यंग्य यहीं खत्म होता है कि जब कई चेहरे चुनावी मौसम में ही दिल्ली का रास्ता पहचानते हैं, तब ऋतु खंडूरी का संवाद नियमित, विषयपरक और परिणामोन्मुख रहता है। न शोर, न शिकवा—बस काम की बात।

अंततः, उत्तराखंड के विकास विमर्श में यह मॉडल संकेत देता है कि केंद्र और राज्य के बीच टकराव नहीं, तालमेल ही प्रगति की कुंजी है। ऋतु खंडूरी का राजनीतिक व्यवहार इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारता दिखता है—कम शब्द, ज्यादा काम और विकास को ही एजेंडा।

Khushi
Author: Khushi

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