कुर्सी नहीं, कर्तव्य का नेतृत्व, मुख्यमंत्री धामी के शासन में जवाबदेही ही सत्ता की पहचान

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यह दौर केवल सत्ता संभालने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी ज़िम्मेदारियाँ याद दिलाने का है और यही बात मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अलग खड़ा करती है। उनका नेतृत्व भाषणों की ऊँचाई से नहीं, ज़मीन पर उतरकर तय होता है। कानून व्यवस्था, जनसेवा और अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देना दरअसल उन पुरानी आदतों पर सीधा तंज है, जहाँ फाइलें चलती थीं, काम नहीं।
धामी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे प्रशासन को जनता के सामने जवाबदेह मानते हैं, न कि जनता को प्रशासन के सामने। सकारात्मक व्यंग्य यही है कि अब कुर्सियाँ आराम के लिए नहीं, जिम्मेदारी निभाने के लिए हैं। जो समय पर नहीं मिला, जिसने फोन नहीं उठाया, जिसने समस्या को टाला उसके लिए अब सिस्टम में “समझाइश” नहीं, समीक्षा और कार्रवाई तय है।
जनता की सुविधा और सुरक्षा को केंद्र में रखकर चलने वाला यह मॉडल दिखाता है कि मुख्यमंत्री जनता को आंकड़ा नहीं, अपना परिवार मानते हैं। ट्रैफिक से लेकर थाने, अस्पताल से लेकर दफ्तर तक—हर जगह एक ही संदेश है कि अगर आम आदमी परेशान है, तो व्यवस्था असफल है। और इस असफलता पर चुप्पी नहीं, सुधार होगा।
धामी का नेतृत्व उन लोगों के लिए असहज है जो सत्ता को ढाल समझते थे। यही सकारात्मक तंज है कि अब पद नहीं बचाएगा, काम बचाएगा। अनुशासन की बात ऊपर से नीचे तक एक समान लागू होना यह बताता है कि मुख्यमंत्री खुद को भी उसी कसौटी पर रखते हैं, जिस पर अधिकारियों को परखा जा रहा है।
यह संपादकीय तौर पर कहना ज़रूरी है कि उत्तराखंड में शासन का चेहरा बदल रहा है। यह चेहरा सख्त है, लेकिन संवेदनहीन नहीं; निर्णायक है, लेकिन अहंकारी नहीं। मुख्यमंत्री धामी जनता के असली सेवक के रूप में सामने आते हैं जो व्यवस्था से सवाल भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर खुद उसका उत्तर भी देते हैं। यही नेतृत्व भरोसा पैदा करता है, और यही भरोसा किसी भी राज्य की सबसे बड़ी ताकत होता है।

Khushi
Author: Khushi

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