जन-जन की सरकार का चेहरा बना उत्तराखंड, दहलीज तक उतरा शासन

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उत्तराखंड की राजनीति में अगर किसी एक चेहरे ने शासन को प्रतीक से निकालकर प्रक्रिया बनाया है, तो वह पुष्कर सिंह धामी हैं। गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की बात उनके लिए कोई भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन का हिस्सा है। यही कारण है कि सरकार योजनाओं की घोषणा नहीं करती, बल्कि उनकी डिलीवरी की समीक्षा करती है। सीएम धामी इस बदलाव के सिर्फ़ नेतृत्वकर्ता नहीं, उसके वाहक हैं वह माध्यम, जिसके जरिए सत्ता गांव की दहलीज तक पहुंचती है।
‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ धामी सरकार की कार्यशैली का स्वाभाविक विस्तार है। यहां मुख्यमंत्री का दायित्व केवल निर्देश देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह फीडबैक लेने तक जाता है। चौपाल पर सुनी गई शिकायतें सचिवालय में आदेश बनती हैं और आदेश जमीन पर परिणाम। यह वही प्रशासनिक चक्र है, जिसमें ग्राम स्वराज नारे से निकलकर व्यवहार बनता है। सकारात्मक व्यंग्य यह है कि आज फाइलें अधिकारियों के टेबल पर नहीं, जनता की उम्मीदों के दबाव में चलती दिखती हैं।
सीएम धामी ने यह समझा है कि अंतिम व्यक्ति तक योजना पहुंचाने का मतलब सिर्फ़ लाभ हस्तांतरण नहीं, बल्कि भरोसे का हस्तांतरण है। इसलिए शासन की भाषा बदली है कठिन शब्दों की जगह सरल संवाद, दूरी की जगह उपस्थिति और टालने की जगह त्वरित समाधान। गांव अब नीति का उपभोक्ता नहीं, साझेदार बन रहा है। यही कारण है कि विकास की चर्चा सड़क की लंबाई से ज़्यादा, भरोसे की चौड़ाई में मापी जा रही है।
राजनीतिक तौर पर यह एक शांत लेकिन गहरा परिवर्तन है। विपक्ष इसे ‘सरकारी दौरा’ कहकर हल्का करता है, जबकि जनता इसे ‘सरकार का पहुंचना’ मानती है। फर्क साफ़ है जहां सत्ता लोगों को बुलाती है, वहां लोकतंत्र औपचारिक होता है; और जहां सत्ता खुद लोगों तक जाती है, वहां लोकतंत्र जीवंत होता है। सीएम धामी इसी जीवंत लोकतंत्र के वाहक हैं।
यह संपादकीय किसी व्यक्ति-पूजा का नहीं, उस नेतृत्व की पहचान का है जो जानता है कि विकास ऊपर से नीचे नहीं, भीतर से बाहर फैलता है। उत्तराखंड में आज शासन दिखता कम, महसूस ज़्यादा हो रहा है। और जब सरकार महसूस होने लगे, तब कहना पड़ता है यह सिर्फ़ शासन नहीं, भरोसे की राजनीति है

Khushi
Author: Khushi

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