
शहर की सड़कों पर निकले डीएम सविन बंसल का यह निरीक्षण महज़ “देखने” की रस्म नहीं था, बल्कि उस आदत पर सवाल था जिसमें कूड़े के ढेर, नालों की गंदगी और अस्थायी झोपड़ियां धीरे-धीरे शहर की पहचान बनती जा रही थीं। रिस्पना पुल से आईएसबीटी और लालपुल तक का दौरा दरअसल देहरादून की उस तस्वीर को सामने लाने जैसा था, जिसे रोज़ लोग देखते हैं, लेकिन व्यवस्था अक्सर अनदेखा कर देती है।
कारगी चौक के पास नाले और बिन्दाल नदी में गंदगी देखकर यह साफ हुआ कि सफाई योजनाएं कागज़ों में भले पूरी हों, ज़मीन पर अभी भी ‘चलने लायक’ ही हैं। अवैध गार्बेज प्वाइंट्स पर डीएम का सख्त रुख यह संकेत देता है कि अब कचरे के ढेर “अस्थायी” कहकर स्थायी नहीं रहने दिए जाएंगे। साफ करने के साथ-साथ दोबारा कचरा न जमे, इस पर ज़ोर देना उस सोच को दर्शाता है जो समस्या के इलाज के साथ उसकी जड़ तक पहुंचना चाहती है।
पुराने डम्पिंग ज़ोन की सफाई और उसके आसपास क्षतिग्रस्त भूमि को सुरक्षित करने के निर्देश इस बात का उदाहरण हैं कि स्वच्छता सिर्फ झाड़ू लगाने तक सीमित नहीं, बल्कि शहर की संरचना सुधारने से जुड़ा विषय है। वहीं आईएसबीटी के पास सड़क किनारे बनी झोपड़ियों को नियमानुसार अन्यत्र शिफ्ट करने के निर्देश उस संवेदनशील संतुलन को दिखाते हैं, जहां मानवीय पहलू और शहर की स्वच्छता-यातायात व्यवस्था—दोनों को साथ रखा गया है।
नालों की नियमित सफाई, कचरा उठान की प्रभावी व्यवस्था और लगातार अभियान की बात सुनने में भले आम लगे, लेकिन जब इन्हें सख्ती से लागू करने का संकेत शीर्ष स्तर से आए, तो संदेश साफ हो जाता है—अब गंदगी को “व्यवस्था का हिस्सा” मानने की छूट नहीं है। सकारात्मक तंज यही है कि अगर ऐसे निरीक्षण नियमित होते रहे, तो शायद देहरादून को साफ रखने के लिए बारिश या त्योहार का इंतज़ार न करना पड़े। जनता के डीएम के रूप में सविन बंसल का यह कदम शहर को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर निगम पर नहीं, पूरे सिस्टम पर डालता है।








