
विधानसभा के भीतर जब किसी जनप्रतिनिधि की आवाज़ सिर्फ औपचारिक सवाल बनकर नहीं, बल्कि ज़मीनी पीड़ा बनकर गूंजे, तब समझना चाहिए कि मामला राजनीति से ऊपर जनजीवन का है। मुजफ्फरनगर में लगातार बढ़ते प्रदूषण को लेकर विधायक पंकज मलिक ने ठीक यही किया। उन्होंने उस सच्चाई को सदन के सामने रखा, जिसे आम आदमी रोज़ सांसों के साथ झेल रहा है, लेकिन जिसे देखने-सुनने से सिस्टम अक्सर आंख मूंद लेता है।
प्रदूषण अब आंकड़ों की बहस नहीं रहा, यह अस्पतालों की भीड़, घर-घर में कैंसर जैसी घातक बीमारियों की दस्तक और समय से पहले बुझती जिंदगियों का नाम बन चुका है। सवाल यह नहीं कि प्रदूषण है या नहीं, सवाल यह है कि इसके पीछे कौन है और अब तक चुप क्यों रहा गया। अवैध औद्योगिक गतिविधियां, नियमों को ठेंगा दिखाते कारखाने, रात के अंधेरे में ज़हर उगलते धुएं और कचरे को नालों-नदियों में बहा देने की ‘व्यवस्था’—यह सब किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि सुनियोजित लापरवाही और मुनाफाखोरी का परिणाम है। विडंबना यह है कि कुछ लोग इसे “रोज़गार” और “विकास” का नाम देकर ज़हर बेचने को भी जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं।
पंकज मलिक ने इसी दोहरे चरित्र पर करारा प्रहार किया। उनका सवाल सीधा था—अगर विकास की कीमत लोगों की जान है, तो ऐसा विकास किसके लिए? उन्होंने सरकार से सिर्फ चिंता जताने की नहीं, बल्कि ठोस और त्वरित कार्रवाई की मांग की, ताकि प्रदूषण फैलाने वाले अवैध कामों पर लगाम लगे और आम जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा हो सके। यह वही स्पष्टता है, जो किसी जनहितैषी नेता की पहचान होती है—ना गोलमोल बातें, ना राजनीतिक पर्देदारी।
इस मुद्दे को उठाना इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदूषण का सबसे बड़ा शिकार वही होता है, जिसकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है—किसान, मजदूर, बच्चे और बुज़ुर्ग। अवैध काम करने वालों के लिए नियम अक्सर कागज़ पर होते हैं, लेकिन बीमारी झेलने वालों के लिए हर सांस एक सज़ा बन जाती है। ऐसे में पंकज मलिक का रुख यह संकेत देता है कि जनप्रतिनिधि अगर चाहे तो सत्ता के गलियारों में भी जनपद की सच्चाई मजबूती से रख सकता है।
मुजफ्फरनगर का प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का भी इम्तिहान है। विधायक द्वारा विधानसभा में उठाया गया यह मुद्दा सरकार के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी—या तो अवैध धंधों पर कठोर कार्रवाई कर जनता के साथ खड़ा होना साबित किया जाए, या फिर इतिहास यह याद रखेगा कि चेतावनी समय रहते दी गई थी, लेकिन उसे अनदेखा कर दिया गया।








