
उत्तराखंड में खनन सुधारों की कहानी दरअसल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व की कहानी है, जहां नीति भी स्पष्ट है और नियत पर कोई संदेह नहीं। जिस खनन क्षेत्र को वर्षों तक अवैध गतिविधियों, भ्रष्टाचार और राजस्व हानि का पर्याय माना जाता था, उसी क्षेत्र को धामी सरकार ने अनुशासन, पारदर्शिता और तकनीक के सहारे सुशासन का उदाहरण बना दिया। यह संयोग नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है।
धामी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुधार कागज़ी घोषणाओं से नहीं, बल्कि सिस्टम बदलने से आते हैं। ई-नीलामी, सैटेलाइट निगरानी और माइनिंग सर्विलांस जैसे कदम यह दिखाते हैं कि सरकार केवल राजस्व बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारने की सोच के साथ आगे बढ़ी। अवैध खनन पर सख्ती ने साफ संदेश दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं। यही वजह है कि खनन राजस्व में चार गुना से अधिक की बढ़ोतरी संभव हो सकी।
केंद्र सरकार द्वारा ₹200 करोड़ की प्रोत्साहन राशि मिलना केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि धामी सरकार के फैसलों पर भरोसे की मुहर है। यह संकेत है कि उत्तराखंड अब सुधारों के मामले में केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्व करने वाले राज्यों की कतार में खड़ा है। स्टेट माइनिंग रेडीनेस इंडेक्स में दूसरा स्थान इस बात का प्रमाण है कि नीति सही दिशा में है और उसका क्रियान्वयन जमीन पर दिखाई दे रहा है।
धामी सरकार की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को नारा नहीं, नीति बनाया। खनन को अव्यवस्था से निकालकर व्यवस्था में लाना, और साथ ही रोजगार व राजस्व के नए अवसर पैदा करना यह स्पष्ट करता है कि सरकार की प्राथमिकता तात्कालिक लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राज्य हित है। उत्तराखंड में खनन सुधार आज एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह भरोसा है कि मजबूत नेतृत्व हो तो कठिन सेक्टर भी बदलाव की मिसाल बन सकते है।








