धामी का उत्तराखंड मॉडल, विहिप के केंद्रीय प्रस्तावों से राष्ट्रीय विमर्श की धुरी बनी देवभूमि

SHARE:

उत्तराखंड आज केवल एक हिमालयी राज्य नहीं, बल्कि समकालीन हिंदू राजनीति और सामाजिक सुधार के विमर्श का केंद्र बनकर उभरा है। समान नागरिक संहिता को लागू कर धामी सरकार ने जिस स्पष्टता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया, उसी ने उत्तराखंड को नीति प्रयोगशाला से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय मॉडल बना दिया है। अब वही मॉडल विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय रणनीति और कार्ययोजना का आधार बनता दिख रहा है।


लैंड जिहाद, लव जिहाद, थूक जिहाद, नकल जिहाद जैसे मुद्दे लंबे समय से सामाजिक अविश्वास, सांस्कृतिक असंतुलन और जनसंख्या संरचना से जुड़े प्रश्नों को जन्म देते रहे हैं। उत्तराखंड सरकार ने इन विषयों पर केवल बयानबाज़ी नहीं की, बल्कि प्रशासनिक और विधायी स्तर पर ठोस रुख अपनाया। अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई हो या विवाह–तलाक–उत्तराधिकार- गोद लेने जैसे मामलों में समान कानून की पहल—धामी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि शासन का उद्देश्य तुष्टिकरण नहीं, बल्कि संतुलन और न्याय है।
विश्व हिंदू परिषद द्वारा इन विषयों को अपने केंद्रीय प्रस्ताव में शामिल करना इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड में अपनाया गया रास्ता अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुका है। हल्द्वानी में प्रस्तावित प्रांतीय बैठक केवल संगठनात्मक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड मॉडल को सामाजिक–सांस्कृतिक स्तर पर विस्तार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह वह बिंदु है जहाँ सरकार की नीति और सामाजिक संगठन की विचारधारा एक-दूसरे को बल देती दिखाई देती हैं।
धामी सरकार का एजेंडा मूलतः समानता, स्पष्टता और सांस्कृतिक सुरक्षा पर केंद्रित है। समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार ने यह संदेश दिया कि कानून धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों के पक्ष में है। इससे न केवल लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय को मजबूती मिली, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि एक समान कानून सामाजिक एकता का आधार बन सकता है।
आज देश के अन्य राज्य उत्तराखंड की ओर देख रहे हैं—कैसे एक सीमित संसाधनों वाला पहाड़ी राज्य बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर निर्णायक नेतृत्व दिखा सकता है। यही धामी का उत्तराखंड मॉडल है: निर्णय में दृढ़ता, नीति में स्पष्टता और क्रियान्वयन में प्रशासनिक साहस। विश्व हिंदू परिषद द्वारा इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की पहल इस बात की पुष्टि है कि उत्तराखंड अब केवल अनुसरण करने वाला राज्य नहीं, बल्कि दिशा देने वाला राज्य बन चुका है।
यह लेख एक संदेश भी है—कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट हो, तो सामाजिक सुधार को टकराव नहीं, समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। उत्तराखंड ने यह कर दिखाया है, और यही कारण है कि आज हिंदू राजनीति और समान नागरिक संहिता जैसे राष्ट्रीय विमर्शों का केंद्र धामी का उत्तराखंड बनता जा रहा है।

Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई