काम करता उत्तराखंड बनाम हताश राजनीति,धामी के फैसलों से बंद हुईं दुकानें, अब आत्मा के नाम पर शोर

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उत्तराखंड की राजनीति को आज जानबूझकर धुंधला करने की कोशिश हो रही है। यह धुंध किसी प्रशासनिक विफलता से नहीं, बल्कि उस हताशा से उठ रही है जो विपक्ष को तब होती है जब सरकार काम करती है, फैसले लेती है और नतीजे दिखाती है। धामी सरकार ने पिछले वर्षों में जो किया है, उसने न केवल विकास की रफ्तार बदली है बल्कि उस सड़े हुए तंत्र पर भी चोट की है जो वर्षों से “कमीशन, कनेक्शन और कन्फ्यूजन” के सहारे फलता-फूलता रहा।
25 हजार से अधिक युवाओं को पारदर्शी तरीके से नौकरी देना कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। नकल माफिया पर बुलडोजर चलाना, सख्त कानून लाना, भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस दिखाना ये वो कदम हैं जिनसे सत्ता के गलियारों में बैठे दलालों की दुकानें बंद हुई हैं। जिनके महीने बंधे रहते थे, जिनकी रोज़ी सत्ता की कमजोरी से चलती थी, वे आज स्वाभाविक रूप से बिलबिला रहे हैं। धामी ने सिर्फ योजनाएँ नहीं चलाईं, उसने पूरे सिस्टम की रीढ़ सीधी करने की कोशिश की और यही बात सबसे ज्यादा चुभ रही है।
जब मुद्दे खत्म हो जाते हैं, तब राजनीति शवों और संवेदनाओं पर चलने लगती है। बिटिया अंकिता के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है, वह न्याय की लड़ाई नहीं, बल्कि न्याय का अपमान है। मुख्य आरोपी जेल में हैं, आजीवन सजा काट रहे हैं। एसआईटी की जांच को अदालत ने स्वीकार किया, साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई हुई। इसके बावजूद अगर हर चौराहे पर एक आत्मा को तार-तार कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जा रही हैं, तो यह न्याय नहीं, निहायत ओछापन है। सबसे दुखद यह कि जिनका नाम लिया जा रहा है, उसी परिवार के साथ ये लोग ईमानदारी से खड़े नहीं हैं बस गुमराह कर रहे हैं, भावनाओं में आग भर रहे हैं।
कांग्रेस अपने काले कालखंड को याद नहीं करना चाहती जब सत्ता में रहते हुए न न्याय था, न संवेदना, न जवाबदेही। आज वही लोग नैतिकता का झंडा उठाए घूम रहे हैं। वामपंथी नरेटिव अलग से गढ़ा जा रहा है जैसे पहाड़ों में विकास नहीं, विनाश हुआ हो; जैसे सख्ती अराजकता हो। हकीकत यह है कि ये लोग देवभूमि को अराजक भूमि में बदलने की बेचैनी में हैं, क्योंकि व्यवस्था उन्हें रास नहीं आती। उन्हें खाई खोदनी है, ताकि प्लेन की राजनीति पहाड़ पर उतार दी जाए संघर्ष नहीं, सिर्फ साजिश।
धामी सरकार की सबसे बड़ी “गलती” यह है कि उसने काम किया। सड़कें, रोजगार, कानून-व्यवस्था, नकल पर चोट, भ्रष्टाचार पर प्रहार इन सबने उन लक्कड़बग्घों को परेशान कर दिया है जो विकास का सामना नहीं कर पाते। इसलिए एक बहन की आड़ लेकर झुंड बनाकर हमला किया जा रहा है। क्योंकि जब विकास सामने खड़ा हो जाए, तो अफवाहें ही हथियार बचती हैं।
उत्तराखंड की जनता सब देख रही है। वह समझती है कि न्याय और राजनीति में फर्क क्या होता है। वह जानती है कि काम करने वाली सरकार कैसी होती है और हवा देने वालों का मकसद क्या है। धामी ने जिनकी दुकानें बंद की हैं, वे शोर मचाएँगे ही। लेकिन देवभूमि को अब शोर नहीं, स्थिरता चाहिए; नाटक नहीं, नतीजे चाहिए। और यही वह रास्ता है जिस पर धामी सरकार चल रही है काम के रास्ते पर, जहां से लौटने का कोई इरादा नहीं।

Khushi
Author: Khushi

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