घोटालों की विरासत और नफरत की राजनीति बनाम धामी का स्थिर, निर्णायक नेतृत्व

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ये सिर्फ़ दुर्भाग्य नहीं, बल्कि उस राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है जहाँ सत्ता की भूख ने सोच, भाषा और संस्कार तीनों को निगल लिया है। कांग्रेस आज उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ विरोध नहीं बचा, विवेक नहीं बचा, बस गाली, घृणा और उन्माद शेष रह गया है। “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” जैसे नारे, किसी की माँ को दी जाने वाली गालियाँ, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की अर्थी निकालकर आत्मसंतोष पाने वाली भीड़ ये सब राजनीति नहीं, ये हताशा का सार्वजनिक प्रदर्शन है। देवभूमि उत्तराखंड यह सब देख रही है, समझ रही है और याद भी रखेगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिनकी राजनीति की भाषा ही ज़हर बन चुकी हो, क्या वे न्याय की बात कर सकते हैं? जो नफरत को हथियार बनाते हों, क्या वे हमारी बहन-बेटियों की पीड़ा समझेंगे? जो युवाओं को दिशा देने के बजाय उन्हें उकसाने में यक़ीन रखते हों, क्या वे भविष्य गढ़ पाएंगे? जवाब खुद उनके कृत्यों में छिपा है। जब तर्क हार जाता है, तब तमाशा शुरू होता है और कांग्रेस आज उसी तमाशे की मुख्य कलाकार बन चुकी है।
सत्तर सालों की सत्ता ने देश को अगर कुछ सबसे मज़बूती से दिया, तो वो है घोटालों का वटवृक्ष। इसकी जड़ें सौदों में, शाखाएँ मंत्रालयों में और छाया देश की प्रतिष्ठा पर पड़ी रही। अब जब वही सत्ता हाथ से फिसली है, तो छटपटाहट स्वाभाविक है लेकिन ये छटपटाहट आत्ममंथन की नहीं, पकड़े जाने की है। सुधार की नहीं, बच निकलने की है। इसलिए नीति की जगह नफरत, विकास की जगह नैरेटिव और जवाबदेही की जगह आरोप परोसे जा रहे हैं।
आज कांग्रेस दोयम दर्जे की राजनीति पर उतर आई है जहाँ मुद्दे नहीं, अफ़वाहें हैं; नेतृत्व नहीं, लाउडस्पीकर हैं; और भविष्य नहीं, बस अतीत की कुंठा है। जो पार्टी कभी संस्थाओं की बात करती थी, वही आज संस्थाओं पर शक करती है। जो लोकतंत्र का पाठ पढ़ाती थी, वही लोकतांत्रिक फैसलों को गाली बनाकर चुनौती देती है। ये विरोध नहीं, ये राजनीतिक दिवालियापन है।
और इसी शोर में पुष्कर सिंह धामी का नेतृत्व और भी स्पष्ट दिखता है शांत, स्थिर और निर्णयात्मक। धामी न गाली का जवाब गाली से देते हैं, न नौटंकी का मुकाबला तमाशे से। यही बात उनके विरोधियों को सबसे ज़्यादा असहज करती है। क्योंकि जिनके पास काम होता है, उन्हें चीखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और जिनके पास कुछ नहीं होता, वही सबसे ज़्यादा चिल्लाते हैं। धामी कांग्रेस से बहुत दूर की चीज़ हैं क्योंकि एक तरफ़ प्रपंच है, दूसरी तरफ़ प्रदर्शन; एक तरफ़ नफरत है, दूसरी तरफ़ नीयत।
उत्तराखंड की राजनीति अब चयन के मोड़ पर नहीं, चरित्र के मोड़ पर खड़ी है। यहाँ सवाल पार्टी का नहीं, प्रवृत्ति का है। जिहादी मानसिकता जैसी उग्र, विध्वंसक और अराजक सोच चाहे वह किसी भी झंडे के नीचे छिपी हो लोकतंत्र में जगह की हक़दार नहीं। देवभूमि को प्रयोगशाला समझने वालों को समझ लेना चाहिए कि यहाँ की जनता मौन ज़रूर है, लेकिन भ्रमित नहीं।
देश बदल चुका है। यहाँ सत्ता विरासत से नहीं, प्रदर्शन से मिलती है। और जब फैसला होगा, तो वो इतना स्पष्ट होगा कि तमाम नैरेटिव, तमाम नारे और तमाम अर्थियाँ सब इतिहास के हाशिये पर चली जाएँगी।

Khushi
Author: Khushi

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