जर्जर व्यवस्था पर चला प्रशासन का बुलडोज़र डीएम सवीन बंसल बने नौनिहालों की सुरक्षा की दीवार

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बरसों से जर्जर दीवारों के साये में पढ़ते नौनिहाल उत्तराखंड की सबसे खामोश सच्चाई थे। बारिश हो या भूकंप की आशंका हर दिन स्कूल नहीं बल्कि जोखिम खुलता था। फाइलों में दबी रिपोर्टें और विभागों की ढिलाई बच्चों की जान से बड़ा अपराध बन चुकी थी। ऐसे माहौल में जब प्रशासन हरकत में आए तो उसे सामान्य आदेश नहीं बल्कि इरादों की दस्तक कहा जाता है।
मुख्यमंत्री के सख्त निर्देश को कागज़ से ज़मीन तक उतारने का काम किया है उत्तराखंडियत के बहुचर्चित आईएएस जिलाधिकारी सवीन बंसल ने। यहाँ फैसला सिर्फ़ ध्वस्तीकरण का नहीं है बल्कि उस व्यवस्था को तोड़ने का है जो खतरे को वर्षों तक “चलने लायक” बताकर टालती रही। दस दिन में सौ स्कूलों की रिपोर्ट आ जाना बताता है कि जब अफ़सर सख्त हो तो सिस्टम लंगड़ा नहीं रहता।
जर्जर स्कूल भवनों को निष्प्रोज्य घोषित करना कोई तकनीकी प्रक्रिया भर नहीं बल्कि एक नैतिक फैसला है। यह स्वीकार करना कि अब तक बच्चों की पढ़ाई नहीं बल्कि उनकी किस्मत दांव पर थी। एक झटके में 76 नहीं बल्कि पूरी लापरवाही की सोच ध्वस्त की जा रही है। एक करोड़ की स्वीकृति राशि सिर्फ़ बजट नहीं बल्कि यह एलान है कि अब बच्चों की जान पर कोई समझौता नहीं होगा।
यहाँ तंज भी ज़रूरी है। वही विभाग जो वर्षों तक आंगणन नहीं बना पाए वही अब आदेश के बाद दौड़ते नज़र आए। फर्क साफ़ है। पहले आदेश औपचारिक थे अब अफ़सर जवाबदेह है। सवीन बंसल का प्रशासनिक अंदाज़ यही कहता है कि देरी अब बहाना नहीं बनेगी और जोखिम अब नियति नहीं रहेगा।
उत्तराखंड की पहाड़ियों में शिक्षा सिर्फ़ किताब नहीं भरोसा होती है। और जब भरोसा टूटता है तो सरकार नहीं व्यवस्था कटघरे में खड़ी होती है। जर्जर हालत का कायाकल्प करने वाला यह आईएएस मॉडल बताता है कि प्रशासन अगर चाहे तो फाइलें नहीं इतिहास बदलता है। यह कार्रवाई ईंट पत्थर गिराने की नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य को संभालने की है। यही सुशासन है और यही असली उत्तराखंडियत।

Khushi
Author: Khushi

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