

ऋषिकेश के सब रजिस्ट्रार कार्यालय में जिलाधिकारी सवीन बंसल का औचक निरीक्षण एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि उस जमी हुई व्यवस्था पर करारा प्रहार है, जो वर्षों से नियमों की कब्र पर बैठकर मनमानी के फूल उगा रही थी। यह छापा दरअसल उस सिस्टम का एक्स-रे था, जिसमें भ्रष्टाचार आदत बन चुका था और लापरवाही दिनचर्या।
जिस कार्यालय से आम नागरिक की संपत्ति, सुरक्षा और भविष्य जुड़ा होता है, वहां सब रजिस्ट्रार की गैरहाजिरी में लिपिक द्वारा रजिस्ट्री होना सीधे-सीधे कानून की हत्या है। संपत्ति मूल्य आंकलन का ज्ञान न होने के बावजूद स्टाम्प शुल्क तय करना केवल अज्ञानता नहीं, बल्कि सुनियोजित स्टाम्प चोरी की प्रयोगशाला है। औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय दरों पर भूखंडों को काटकर करोड़ों की रजिस्ट्री कर देना यह बताने के लिए काफी है कि यहां नियम नहीं, रेट तय होते थे।
डीएम के सवालों पर बगले झांकते लिपिक व्यवस्था की उसी नंगी सच्चाई को उजागर करते हैं, जहां सालों से जवाबदेही की जगह जुगाड़ ने ले रखी थी। मौके पर मौजूद फरियादियों की आपबीती किसी एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि हजारों लोगों की सामूहिक चीख है, जो महीनों से मूल दस्तावेज और नकल के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। तीन दिन की समयसीमा को वर्षों में बदल देना प्रशासनिक क्रूरता की पराकाष्ठा है।
अलमारियों में धूल खाते सैकड़ों मूल विलेख इस बात के गवाह हैं कि इस दफ्तर में कानून नहीं, मनमानी चलती थी। अर्जेंट नकल की 24 घंटे की व्यवस्था यहां मजाक बन चुकी थी। महीनों और वर्षों से लंबित नकलें यह साबित करती हैं कि सिस्टम आम आदमी को थकाकर समझौते के लिए मजबूर करता रहा।
घोस्ट कर्मचारी की मौजूदगी ने पूरे ढांचे पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। बिना नियुक्ति पत्र और बिना उपस्थिति के कर्मचारी वर्षों से काम कर रहा था और किसी को खबर तक नहीं। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम के भीतर पनपते उस अंधेरे नेटवर्क का संकेत है, जिसमें फर्जीवाड़ा संस्थागत रूप ले चुका था। कंप्यूटर का जब्त होना और कूटरचित विलेखों का मिलना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मामला महज प्रशासनिक गड़बड़ी का नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक साजिश का है।
ऐसे माहौल में जिलाधिकारी सवीन बंसल की कार्रवाई एक अफसर की नहीं बल्कि एक सिस्टम सुधारक की भूमिका में सामने आती है। वे उन अधिकारियों में हैं जिन्हें कुर्सी का भार नहीं, जिम्मेदारी की धार चाहिए। उनके लिए निरीक्षण खानापूर्ति नहीं बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने का जरिया है। उनके सवाल सत्ता के नहीं, कानून के सवाल हैं। उनके फैसले दिखावे के नहीं, परिणाम देने वाले हैं।
यह कार्रवाई उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहेगी। यह पूरे देश के लिए संदेश है कि अगर प्रशासन चाहे तो वर्षों से जमी गंदगी को भी एक झटके में उजागर कर सकता है। यह उन तमाम दफ्तरों के लिए चेतावनी है, जहां नियम फाइलों में कैद हैं और मनमानी खुलेआम चलती है।
दरअसल यह छापा भ्रष्ट व्यवस्था पर पड़ा वह तमाचा है, जिसकी गूंज दूर तक जाएगी। अब यह साफ हो गया है कि सिस्टम में बैठे चेहरे बदल सकते हैं, पर कानून की आंख नहीं बदलेगी। और जब जिलाधिकारी सवीन बंसल जैसे अफसर मैदान में उतरते हैं, तो लापरवाही का हर किला ढहना तय हो जाता है। यही सख्त प्रशासन की असली पहचान है, यही सुशासन की बुनियाद है, और यही वह बदलाव है जिसकी देश को लंबे समय से प्रतीक्षा थी।








