जनगणना में बाधा पर डीएम का निर्णायक एक्शन कानून से भाग नहीं पाई अफसरशाही

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देहरादून में जनगणना को लेकर जो तस्वीर सामने आई है वह सिर्फ दो अफसरों की अनुपस्थिति की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें कुछ पद खुद को जवाबदेही से ऊपर मानने लगते हैं। जनगणना जिस पर देश की नीतियां बजट आरक्षण योजनाएं और संसाधनों का पूरा गणित टिका होता है अगर उसकी शुरुआत ही बाधित हो जाए तो यह लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था के साथ किया गया सीधा खिलवाड़ है। भारत सरकार गृह मंत्रालय ने जब जिलाधिकारी को प्रमुख जनगणना अधिकारी नामित किया तो इसका अर्थ साफ था कि जिले में जनगणना सर्वोच्च प्राथमिकता है न कि एक औपचारिक प्रक्रिया।
28 जनवरी 2026 को निदेशक जनगणना और जिला प्रशासन की संयुक्त बैठक बुलाई गई। लिखित सूचना दी गई दूरभाष से अवगत कराया गया फिर भी छावनी परिषद क्लेमनटाउन और कैन्ट बोर्ड गढ़ी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बैठक में नहीं पहुंचे। निदेशक जनगणना ने कड़ा रोष जताया लेकिन शायद इसे भी हल्के में लिया गया। 31 जनवरी को दोबारा बैठक रखी गई। इस बार अपर जिलाधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से फोन कर बैठक के महत्व को समझाया फिर भी वही अनुपस्थिति रही। यहीं यह स्पष्ट हो जाता है कि मामला भूल का नहीं बल्कि सोच का है।
अब सवाल यह था कि जिला प्रशासन क्या करे। क्या चुप रहे। क्या फाइल दबा दे। क्या इसे समन्वय की कमी बताकर आगे बढ़ जाए। यहीं पर जिलाधिकारी देहरादून की भूमिका निर्णायक बनती है। डीएम ने आसान रास्ता नहीं चुना। उन्होंने यह तय किया कि अगर आज जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य में ढिलाई को नजरअंदाज किया गया तो कल हर सरकारी आदेश सुझाव बनकर रह जाएगा। उन्होंने निदेशक जनगणना के साथ खड़े होकर Census Act 1948 के तहत कार्यवाही की संस्तुति को आगे बढ़ाया। यह जल्दबाजी नहीं बल्कि एक स्पष्ट संदेश था कि जिम्मेदारी वैकल्पिक नहीं होती।
Census Act की धाराएं सिर्फ कागजी डर नहीं हैं। एक माह तक के कारावास का प्रावधान यह बताता है कि जनगणना कार्य में बाधा को कितना गंभीर अपराध माना गया है। जिला प्रशासन द्वारा अग्रिम विधिक कार्यवाही शुरू करना यह साबित करता है कि कानून सिर्फ आम नागरिक के लिए नहीं बल्कि अफसरों पर भी समान रूप से लागू होता है। यहीं से विरोध शुरू होता है। क्योंकि जब तक प्रशासन नरम रहता है तब तक सबको सुविधा रहती है। जैसे ही कानून सख्ती से लागू होता है वही लोग इसे तानाशाही बताने लगते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में जिलाधिकारी देहरादून एक मजबूत दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रशासक के रूप में सामने आते हैं। उन्होंने न व्यक्तिगत संबंध देखे न किसी दबाव को महत्व दिया। उन्होंने सिर्फ यह देखा कि जनगणना का कार्य रुका हुआ है और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यही प्रशासनिक संकल्प किसी जिले को मजबूत बनाता है। जब एक डीएम यह स्पष्ट कर देता है कि राष्ट्रीय दायित्व में लापरवाही पर कार्रवाई होगी तो यह संदेश सिर्फ दो अधिकारियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे सिस्टम में जाता है।
देहरादून की यह कहानी दरअसल एक सीधा सवाल छोड़ती है। क्या हम ऐसा प्रशासन चाहते हैं जो हर चूक को मैनेज कर दे या ऐसा प्रशासन जो कानून और जिम्मेदारी के साथ खड़ा हो। जिलाधिकारी देहरादून ने अपना जवाब साफ दे दिया है। और शायद यही वजह है कि कुछ लोगों को यह जवाब चुभ रहा है। क्योंकि जब व्यवस्था सीधी चलने लगती है तब सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें होती है जो टेढ़े रास्तों के आदी होते हैं।

Khushi
Author: Khushi

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सबसे ज्यादा पड़ गई