देहरादून की सियासी फिजां में इन दिनों एक ही नाम की गूँज है—पुष्कर सिंह धामी। राजनीति के मैदान में तालियां हमेशा उसी के हिस्से आती हैं जो ‘नायक’ की तरह फैसले लेना जानता हो, और धामी ने उत्तराखंड में अपनी यही छवि गढ़ ली है। अब उनकी नजर राज्य की मातृशक्ति के अटूट विश्वास पर है, जिसे हासिल करने के लिए उन्होंने अपनी पूरी बिसात बिछा दी है। आगामी 28 अप्रैल को होने वाला विधानसभा का विशेष सत्र महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए एक कड़ा इम्तिहान साबित होने वाला है।
धामी सरकार इस सत्र में महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक ऐसा ‘निंदा प्रस्ताव’ लाने की तैयारी में है, जो सीधे तौर पर कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर देगा। भाजपा का इरादा साफ है—नारी शक्ति के अधिकारों की लड़ाई को एक सामाजिक आंदोलन का रूप देकर उसे घर-घर तक पहुँचाना। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह पूरी कवायद विपक्षी दलों को भावनात्मक और नैतिक मोर्चे पर पस्त करने की एक सोची-समझी रणनीति है। दरअसल, उत्तराखंड जैसे राज्य में महिलाएं अब केवल ‘वोट बैंक’ नहीं रह गई हैं, बल्कि वे जीत-हार का सबसे बड़ा निर्णायक कारक बन चुकी हैं।
समान नागरिक संहिता (UCC) को जमीन पर उतारना हो, देश का सबसे कठोर नकल विरोधी कानून बनाना हो, या सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसदी क्षैतिज आरक्षण देना—धामी ने एक के बाद एक कई मास्टरस्ट्रोक खेले हैं। 9,000 एकड़ सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराना और ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं ने जमीन पर उनकी लोकप्रियता का ग्राफ काफी ऊंचा कर दिया है। स्थिति यह है कि 2027 के चुनाव के लिए भाजपा के पास मुख्यमंत्री के तौर पर पुष्कर सिंह धामी एक निर्विवाद चेहरा हैं, जबकि दूसरी ओर गुटों में बंटी कांग्रेस अभी भी अपने भीतर जमी धूल झाड़ने की जद्दोजहद में लगी है। धामी ने स्पष्ट कर दिया है कि नारी शक्ति के सम्मान और उनके अधिकारों के मामले में वे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते।








