उत्तराखंड की राजधानी देहरादून तेजी से बदल रही है। नई सड़कें बन रही हैं, आवासीय परियोजनाएं आकार ले रही हैं, शहरी सुविधाओं का विस्तार हो रहा है और विकास की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस तेज़ विकास के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि क्या पर्यावरण भी सुरक्षित रह पाएगा? क्या हरियाली और विकास एक साथ चल सकते हैं?
मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी की कार्यशैली इस सवाल का सकारात्मक उत्तर देती दिखाई देती है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर एमडीडीए द्वारा 300 पौधों का वृहद पौधारोपण अभियान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस सोच का हिस्सा था जिसमें विकास और प्रकृति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि पूरक माना जाता है। सहस्त्रधारा रोड और नालापानी क्षेत्र में किया गया पौधारोपण इस बात का संकेत है कि राजधानी के भविष्य को केवल कंक्रीट के जंगलों के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि उसे हरित और पर्यावरण अनुकूल बनाने की भी गंभीर कोशिश की जा रही है।
बंशीधर तिवारी की पहचान केवल एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नहीं बनी है। देहरादून में “नो व्हीकल डे” जैसी पहल को आगे बढ़ाने से लेकर सार्वजनिक परिवहन और पर्यावरणीय जागरूकता को प्रोत्साहित करने तक, उन्होंने कई ऐसे प्रयास किए हैं जिनका सीधा संबंध लोगों के जीवन और पर्यावरण से जुड़ता है। यही कारण है कि उनकी कार्यशैली को केवल फाइलों तक सीमित प्रशासन नहीं, बल्कि जनसरोकारों से जुड़ा प्रशासन माना जाता है।
आज जब देश के अधिकांश शहर प्रदूषण, ट्रैफिक और हरित क्षेत्रों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब देहरादून में पार्कों का विकास, ग्रीन बेल्ट का विस्तार, सड़क डिवाइडरों पर पौधारोपण और खाली भूमि को हरित क्षेत्रों में बदलने की पहल एक दूरदर्शी सोच को दर्शाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बंशीधर तिवारी केवल पौधे लगाने की बात नहीं करते, बल्कि पौध संरक्षण पर भी उतना ही जोर देते हैं। उनका यह कथन कि “पौधारोपण नहीं, पौध संरक्षण भी जरूरी है” आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। देश में हर वर्ष लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी देखभाल और संरक्षण के अभाव में उनमें से बड़ी संख्या वृक्ष बनने से पहले ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में संरक्षण आधारित दृष्टिकोण ही वास्तविक पर्यावरण संरक्षण का आधार बन सकता है।
देहरादून की पहचान हमेशा से उसकी हरियाली, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक सुंदरता रही है। यदि शहरी विकास की योजनाओं में पर्यावरण को केंद्र में रखा जाए तो दून घाटी आने वाले वर्षों में देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकती है। एमडीडीए द्वारा चलाए जा रहे अभियान इसी दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस पर लगाया गया प्रत्येक पौधा केवल एक पौधा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, बेहतर जलवायु और सुरक्षित भविष्य का निवेश है। यदि प्रशासन, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाते हैं तो देहरादून ही नहीं, पूरा उत्तराखंड हरित विकास का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।
आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि हर नागरिक के भीतर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाने की है। यही संदेश इस अभियान से निकलकर सामने आया है और यही संदेश भविष्य के भारत की दिशा भी तय करेगा।








