कंक्रीट के बढ़ते विस्तार के बीच यदि कोई शहर अपनी हरियाली बचाने का संकल्प लेता है, तो वह केवल सौंदर्यीकरण का प्रयास नहीं होता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की नींव भी रखता है। देहरादून में मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) इसी सोच को धरातल पर उतारता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हरित विकास के विजन को आगे बढ़ाते हुए प्राधिकरण ने इस वर्ष एक लाख पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अभियान का केंद्र केवल पौधरोपण नहीं, बल्कि प्रत्येक पौधे का संरक्षण है।
सोमवार सुबह एमडीडीए के उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी जब कार्यालय जा रहे थे, तभी सड़क डिवाइडरों पर चल रहा पौधरोपण अभियान उनकी नजर में आया। उन्होंने बिना औपचारिकता के वाहन रुकवाया, मौके पर पहुंचे और पूरे कार्य का निरीक्षण किया। उन्होंने पौधों की गुणवत्ता, रोपण की प्रक्रिया और उनकी देखभाल की व्यवस्थाओं का बारीकी से जायजा लिया। कर्मचारियों के साथ स्वयं पौधा लगाकर उन्होंने यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल आदेशों से नहीं, बल्कि नेतृत्व की भागीदारी से सफल होता है।
बंशीधर तिवारी ने स्पष्ट कहा कि पौधरोपण का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब लगाया गया प्रत्येक पौधा जीवित रहकर एक घने वृक्ष का रूप ले। उन्होंने अधिकारियों को नियमित सिंचाई, सुरक्षा और निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। यह सोच बताती है कि सफलता पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जीवित हरियाली से मापी जानी चाहिए।
एमडीडीए का अभियान देहरादून के प्रमुख मार्गों, डिवाइडरों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों तक फैल चुका है। इसका उद्देश्य केवल शहर को आकर्षक बनाना नहीं, बल्कि प्रदूषण कम करना, तापमान संतुलित रखना, जैव विविधता को बढ़ावा देना और नागरिकों को स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराना है। हरित क्षेत्र का विस्तार किसी भी आधुनिक शहर की पर्यावरणीय सुरक्षा का सबसे प्रभावी आधार माना जाता है।
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल पौधे नहीं लगाए जा रहे, बल्कि उन्हें भविष्य की धरोहर मानकर संरक्षित किया जा रहा है। यही दृष्टिकोण इसे सामान्य पौधरोपण कार्यक्रमों से अलग बनाता है। कर्मचारियों की मेहनत, नियमित निगरानी और नेतृत्व की सक्रियता इस पहल को अधिक प्रभावी बना रही है।
एमडीडीए सचिव मोहन सिंह बर्निया ने भी स्पष्ट किया कि जनसहभागिता के बिना कोई भी हरित अभियान पूर्ण नहीं हो सकता। यदि नागरिक लगाए गए पौधों को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानें, तो देहरादून को हरित और पर्यावरण-अनुकूल राजधानी बनाने का लक्ष्य शीघ्र साकार हो सकता है।
पर्यावरण संरक्षण आज विकल्प नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसके साथ प्रकृति भी सुरक्षित रहे। यदि पौधरोपण, संरक्षण और जनभागीदारी का यह मॉडल निरंतर आगे बढ़ता है, तो देहरादून केवल विकास की नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता और हरित भविष्य की भी मिसाल बनेगा।








