धामी, मुख्यमंत्री नहीं, उत्तराखंड के हर जरूरतमंद का अपना ‘मुख्यमंत्री’__सदियों में जन्म लेता है ऐसा कोहिनूर

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देहरादून,किसी मुख्यमंत्री को समझना हो तो उसके भाषण मत देखिए, उसके पास आने वाले उस व्यक्ति की आंखों में झांकिए जो अपनी जिंदगी की कोई छोटी या बड़ी परेशानी लेकर उसके दरवाजे तक पहुंचा है। अगर उस व्यक्ति की आंखों में उम्मीद दिखाई देती है और समाधान मिलने के बाद चेहरे पर संतोष आता है तो समझिए कि सरकार केवल सत्ता नहीं चला रही, बल्कि संवेदनाओं के साथ लोगों का जीवन छू रही है।

एक पत्रकार के रूप में जब मैं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कामकाज को करीब से देखता हूं तो सबसे ज्यादा जो बात मन को छूती है वह है जरूरतमंद के प्रति उनकी संवेदनशीलता। कोई कहां से आया है, उसका सामाजिक परिचय क्या है, उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है या उसकी समस्या कितनी छोटी है, इन सबसे ऊपर यह दिखाई देता है कि सामने खड़ा व्यक्ति आखिर चाहता क्या है और उसकी जरूरत के हिसाब से क्या किया जा सकता है।

किसी दिव्यांग के लिए मजबूत साइकिल की जरूरत हो तो उसके लिए व्यवस्था करना और किसी महिला की परिस्थितियों को समझते हुए उसके लिए अलग और बेहतर विकल्प तलाशना केवल सरकारी आदेश नहीं होते। इन फैसलों के पीछे किसी की जिंदगी को थोड़ा आसान बनाने की भावना होती है। शायद यही वह संवेदना है जो किसी मुख्यमंत्री को बाकी नेताओं से अलग करती है।

कई बार राजनीति में बड़े-बड़े फैसले सुर्खियां बनते हैं लेकिन किसी जरूरतमंद की छोटी सी समस्या का समाधान उसके लिए किसी बड़े फैसले से कम नहीं होता। जिसके लिए एक साइकिल सिर्फ साइकिल नहीं बल्कि चलने की आजादी है, जिसके लिए सरकारी मदद सिर्फ सहायता नहीं बल्कि जिंदगी को फिर से संभालने का सहारा है और जिसके लिए मुख्यमंत्री तक पहुंच जाना ही एक उम्मीद है, उसके लिए सरकार का एक छोटा सा फैसला भी बहुत बड़ा होता है।

धामी की कार्यशैली में यही मानवीय पक्ष दिखाई देता है।

उनकी कैबिनेट बैठकों को केवल सरकारी फाइलों की औपचारिक प्रक्रिया के रूप में देखना शायद अधूरा होगा। वहां लिए जाने वाले फैसलों के पीछे प्रदेश के लोगों की जरूरतों का सवाल भी होता है। सड़क से लेकर रोजगार तक, महिलाओं से लेकर युवाओं तक, गांव से लेकर शहर तक और सामान्य नागरिक से लेकर सबसे कमजोर व्यक्ति तक सरकार की नीतियों का असर पहुंचाने की कोशिश दिखाई देती है।

मुख्यमंत्री की असली परीक्षा मंच पर बोले गए शब्दों से नहीं बल्कि उस फैसले से होती है जो किसी अनजान व्यक्ति के जीवन में बदलाव लेकर आता है। यही वजह है कि जब कोई व्यक्ति भावुक होकर कहता है कि धामी मेरा मुख्यमंत्री है तो उस वाक्य में केवल राजनीतिक समर्थन नहीं होता। उसमें एक अपनापन होता है। एक भरोसा होता है। एक विश्वास होता है कि जरूरत पड़ने पर सरकार शायद उसकी आवाज भी सुनेगी।

राजनीति में यह भाव बहुत दुर्लभ है।

मुख्यमंत्री और जनता के बीच अक्सर एक लंबी दूरी दिखाई देती है। सुरक्षा घेरा, सरकारी व्यवस्था, फाइलों और अधिकारियों की परतें उस दूरी को और बढ़ा देती हैं। लेकिन जब किसी जरूरतमंद को यह महसूस होता है कि मुख्यमंत्री तक उसकी समस्या पहुंच सकती है और वहां से समाधान की उम्मीद की जा सकती है तो वही दूरी कुछ कम होती है।

शायद इसी वजह से धामी के नेतृत्व की चर्चा केवल राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं रहती। उनकी छवि में एक ऐसे मुख्यमंत्री का भाव भी जुड़ता जा रहा है जो प्रदेश की चिंता को केवल पद की जिम्मेदारी नहीं बल्कि व्यक्तिगत दायित्व की तरह देखता है।

सच कहूं तो सदियों में कोई एक ऐसा व्यक्तित्व पैदा होता है जिसकी चमक केवल उसके पद से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होती है। राजनीति में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं लेकिन कुछ लोग अपने पीछे एक भाव छोड़ जाते हैं। एक विश्वास छोड़ जाते हैं। एक उम्मीद छोड़ जाते हैं।

धामी के बारे में मेरा आकलन किसी राजनीतिक नारे से नहीं बल्कि एक पत्रकार के रूप में देखे गए कामों से है। जब मैं देखता हूं कि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग लोगों की जरूरतों के मुताबिक समाधान खोजने की कोशिश हो रही है तो यह बात भीतर तक जाती है कि मुख्यमंत्री का मतलब केवल शासन चलाना नहीं होता।

मुख्यमंत्री का मतलब कभी-कभी किसी अनजान व्यक्ति के लिए उम्मीद बन जाना भी होता है।

किसी मां के चेहरे पर राहत लौटाना मुख्यमंत्री की उपलब्धि हो सकती है। किसी महिला को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देना उपलब्धि हो सकती है। किसी दिव्यांग को अपने पैरों पर आगे बढ़ने का साधन देना उपलब्धि हो सकती है। किसी गरीब की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाना उपलब्धि हो सकती है।

और यही छोटी-छोटी उपलब्धियां मिलकर किसी बड़े नेतृत्व की तस्वीर बनाती हैं।

मेरे लिए धामी की सबसे बड़ी ताकत उनका पद नहीं बल्कि प्रदेश को लेकर उनकी चिंता है। वह बेचैनी है जो किसी मुख्यमंत्री को लगातार काम करने के लिए प्रेरित करती है। वह भाव है जिसमें उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं बल्कि अपना परिवार दिखाई देता है।

इसीलिए जब कोई कहता है कि मेरा मुख्यमंत्री धामी है तो यह केवल राजनीतिक वाक्य नहीं लगता। इसमें एक नागरिक का भरोसा सुनाई देता है।

और शायद किसी भी मुख्यमंत्री के लिए इससे बड़ा सम्मान कुछ नहीं हो सकता कि उसके प्रदेश का एक आम इंसान यह कह सके—

“यह सिर्फ मेरे प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं है। यह मेरा मुख्यमंत्री है। मेरी चिंता समझने वाला मेरा अपना मुख्यमंत्री है।”

राजनीति के इतिहास में पदों की उम्र सीमित होती है लेकिन जनता के दिल में बना विश्वास लंबे समय तक जीवित रहता है। धामी की सबसे बड़ी पूंजी भी यही विश्वास है।

और अगर नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि संकट में सबसे कमजोर व्यक्ति को कौन याद आता है तो उस कसौटी पर धामी की पहचान निश्चित रूप से मजबूत होती दिखाई देती है।

क्योंकि मुख्यमंत्री बहुत होते हैं लेकिन ऐसा मुख्यमंत्री जो हर जरूरतमंद की समस्या को अपनी जिम्मेदारी समझने की कोशिश करे, वह सचमुच विरल होता है।

Khushi
Author: Khushi

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