
जब व्यवस्था की नब्ज़ सुस्त पड़ रही हो और मेडिकल कॉलेजों की शिराओं में शिक्षकविहीनता का रक्त संचार थमने लगे, तब कोई तो हो जो स्टेथोस्कोप नहीं, संकल्प थामे खड़ा हो। उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से खाली पड़ी कुर्सियाँ जैसे नीतियों की अनसुनी धड़कनें बन गई थीं। इन्हीं कुर्सियों को जीवनदान देने का काम किया है स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार ने—वो भी किसी हड़बड़ी में नहीं, बल्कि संतुलित परिश्रम और सटीक योजना के साथ।
ऐसा नहीं कि डॉ. राजेश ने कोई जादू की छड़ी घुमाई हो, पर उनकी कार्यशैली में जो पारदर्शिता, जो समयबद्धता और जो कर्मशीलता है, वह आज के बाबूगिरी के युग में किसी दुर्लभ औषधि से कम नहीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि चाह हो और नीयत साफ़ हो, तो वर्षों से जमे धूल भरे फाइलों में भी हरियाली फूट सकती है।
18 प्रोफेसर और 36 एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्ति—सिर्फ संख्या नहीं, यह उन मेडिकल छात्रों की उम्मीद है जो अब अपने शिक्षकों से केवल किताबें नहीं, अनुभव भी पढ़ेंगे। और यह भी तय है कि जिन कॉलेजों में अब तक गूंजते थे सिर्फ अस्थायी शिक्षकों के अस्थायी व्याख्यान, वहाँ अब स्थायित्व की गूंज सुनाई देगी।
डॉ. राजेश अब सिर्फ सचिव नहीं रहे—वे उस स्वास्थ्य व्यवस्था के ‘वैकसीन’ बन चुके हैं, जो वर्षों से भर्तीविहीनता रूपी महामारी से ग्रसित थी। उनकी टीम को भी सराहना मिलनी चाहिए, लेकिन मुख्य डॉक्टर तो वही हैं, जिन्होंने इस ऑपरेशन को न सफल केवल किया, बल्कि बिना किसी दुष्प्रभाव के किया।
सत्ता में बैठे लोग अक्सर घोषणाएँ करते हैं—”हम सुधार करेंगे”—पर डॉ. राजेश ने यह बताया कि सुधार किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस का मसाला नहीं, बल्कि हर दिन की मेहनत, फॉलो-अप और ज़िम्मेदारी का नाम है।
यह तंज नहीं, सच्चाई है—जब सचिव अपनी फाइल से बाहर निकलकर सिस्टम की सर्जरी करे, तब मंत्रालय नहीं, खुद स्वास्थ्य मुस्कुराता है।








