“बेटियों की अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों पर चलेगा धामी का बुलडोजर — ये देवभूमि है, जिहादिस्तान नहीं!”

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उत्तराखंड की शांत वादियों में जब किसी मासूम की चीखें गूंजती हैं, तो वह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं होता — वह पूरे समाज के विवेक पर प्रहार होता है। नैनीताल में नाबालिग से दुष्कर्म करने वाला आरोपी उस्मान अब कानून के शिकंजे में है, लेकिन असली खबर यह नहीं कि उसे जेल भेजा गया, असली बात ये है कि अब उसके अवैध साम्राज्य पर धामी सरकार का बुलडोजर गरजने वाला है।

धामी सरकार का यह एक्शन केवल ‘गिरफ्तारी’ से आगे की कहानी है — यह एक प्रतीक है, संदेश है, और चेतावनी है। और यह संदेश साफ है — अगर उत्तराखंड की बेटियों की ओर कोई आंख उठाएगा, तो उसकी छत ही नहीं, उसकी हेकड़ी भी गिरा दी जाएगी।

नगर पालिका ने नोटिस चस्पा कर दिया है। आरोपियों की पहचान चाहे ‘क’ से हो या ‘उ’ से, कानून अब वर्णमाला के हर अक्षर पर समान रूप से लागू होगा। वन विभाग की जमीन पर खड़ा किया गया वह मकान, जो अब तक सत्ता, पहुँच या पहचान के बल पर अचल समझा जाता था, अब खुद थरथरा रहा है। बुलडोजर सिर्फ दीवारें नहीं गिराता, वह घमंड भी ढहा देता है।

कुछ लोग अब भी कान में तेल डालकर बैठे हैं कि कहीं यह “सांप्रदायिक” ना कह दिया जाए, मगर सवाल ये है कि जब किसी की दरिंदगी मासूमियत को रौंदती है, तो धर्म की दीवारें क्यों खड़ी की जाएं? बेटी का धर्म नहीं होता, उसकी चीख का मजहब नहीं होता। और इस बार आवाज आई है मुख्यमंत्री आवास से — कि अब ‘सख्ती’ सिर्फ भाषणों में नहीं, कार्रवाई में दिखेगी।

यह कार्रवाई सिर्फ उस्मान के खिलाफ नहीं है — यह एक रेखा खींचने की कोशिश है। एक लक्ष्मण रेखा, जिसे जो लांघेगा, उसके लिए बुलडोजर सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि जनता के गुस्से की आवाज़ बनेगा। और जनता अब तुष्टीकरण की राजनीति से तंग आ चुकी है। उन्हें अब नारे नहीं, नतीजे चाहिए।

हिंदू संगठनों ने संतोष जताया है, लेकिन ये संतोष स्थायी नहीं रहेगा अगर यह बुलडोजर केवल दिखावे की कवायद बन जाए। यह बुलडोजर हर उस अवैध मानसिकता पर भी चले जो सोचती है कि वह कानून से ऊपर है।

धामी इस बार सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं दिख रहे — वे उस समाज के प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं जो अब न्याय में त्वरितता चाहता है, और उदाहरण भी। शायद यही वजह है कि ‘धामी धाकड़’ का नाम अब सिर्फ भाषणों में नहीं, बुलडोजर के पहियों में गूंज रहा है।

और हां, ये सिर्फ शुरुआत है। अगर आपने उत्तराखंड की मिट्टी को हल्के में लिया, तो याद रखिए — यहां की चट्टानों पर तो इतिहास खुदा हुआ है, आपकी अवैध दीवारें क्या चीज़ हैं।

Khushi
Author: Khushi

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