“टीपू की कब्र पर झुका राकेश टिकैत का सिर, गायब किसान की पगड़ी — आंदोलन के नाम पर गद्दारी की इबारत”

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टीपू सुल्तान की कब्र पर खड़े हैं ये महाराज — चेहरे पर अजीब-सा आत्ममुग्ध भाव, मानो कोई तीर्थ यात्रा पर आए हों। लेकिन ये कोई तीर्थ नहीं, ये उसी टीपू की कब्र है जिसने लाखों हिन्दुओं की अस्मिता को तलवार से रौंदा, मंदिरों को जलाया, जबरन धर्मांतरण करवाया, और जिनके हाथों में कलम नहीं, केवल कट्टरता की कटार रही।

और वहां खड़ा ये स्वघोषित किसान नेता, अपनी ‘धरती से जुड़ी’ छवि का पोस्टर बनवाने आया है। चेहरे पर वही बनावटी संजीदगी, जो आंदोलन के दिनों में आंसुओं में बहती थी। फर्क बस इतना है — तब आंखें किसानों के नाम पर नम थीं, आज वो आंखें टीपू सुल्तान की कब्र से moist हैं। क्या खूब इमोशन शिफ्ट हुआ है।

सबसे अहम बात — सर से पगड़ी गायब है। वही पगड़ी, जिसे इन्होंने ‘किसान की इज्जत’ कहा था। वही पगड़ी, जिसे गिराने की बात पर पूरे देश को ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ में बांध दिया था। आज उस पगड़ी का कोई नामो-निशान नहीं। न जाने पगड़ी उतारकर कब्र के पत्थरों पर रख दी, या किसी सौदे में गिरवी रख दी। अब वहां केवल झुका हुआ सिर है — और सामने एक गद्दार सुल्तान की समाधि।

गद्दारी सिर्फ अपने वचनों से नहीं होती — गद्दारी अपने पूर्वजों की स्मृति से भी होती है। और इस देश के लाखों किसानों, विशेषकर हिन्दू कृषकों, जिनकी पीढ़ियाँ टीपू जैसे नरपिशाचों के आतंक से गुज़रीं, उनके जख्मों पर फूल नहीं, नमक छिड़का गया है।

ये वही टीपू है जिसने कृष्ण मंदिरों को गिराकर मस्जिदें बनाईं, वही जिसने ‘राम’ के नाम पर रक्त बहाया — और आज उसी की कब्र पर एक तथाकथित किसान नेता खड़ा होकर फोटो खिंचवा रहा है, मानो कोई शौर्य की मूरत हो। ये किसान का नेता नहीं, अवसरवाद का पुरोहित है।

ग़द्दारी की पराकाष्ठा तब होती है जब आप अपनी जड़ों से कटकर परायों की कब्रों पर नतमस्तक हो जाएं — और उसे “संस्कार” कहें।

ये न पगड़ी के लायक रहा, न नेतृत्व के। जिस पगड़ी को सिर पर रखकर किसान आंदोलन का नायक बनने चला था, उसी पगड़ी को टीपू के क़दमों में फेंक आया — और अब नज़रें चुराकर “समरसता” का पाठ पढ़ा रहा है।

किसान जानता है कौन खेत जोतता है और कौन कब्रों की दलाली करता है। ये आदमी अब आन्दोलन का प्रतिनिधि नहीं, इतिहास का धोखेबाज़ पात्र है।

अब जरूरत है साफ शब्दों की — ये किसान आंदोलन का मसीहा नहीं, एक ऐसा गद्दार है जो सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए अपने पुरखों की अस्थियाँ भी गिरवी रख देगा।

और किसान — वो अब भी जागा हुआ है। उसने देख लिया है, पगड़ी उतर गई है, और इस बार कोई ‘डॉक्यूमेंट्री’ उसे वापस नहीं ला पाएगी।

Khushi
Author: Khushi

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