“अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक भरोसे और योजनाओं की सीधी पहुंच बना रहे हैं डीएम सविन बंसल”

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कभी-कभी सरकारी योजनाओं की गूंज दिल्ली के दरबारों से ज्यादा दूरदराज के पहाड़ों में सुनाई देती है। लाखामंडल जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्र में डीएम सविन बंसल का बहुउद्देशीय शिविर लगाना न केवल प्रशासनिक सक्रियता का प्रतीक है, बल्कि यह साबित करता है कि आज भी सिस्टम में कुछ ऐसे अफसर मौजूद हैं जिनकी कार्यशैली फाइलों में नहीं, जनता के बीच गूंजती है।

मुख्यमंत्री के ‘दुर्गम प्रथम’ संकल्प को डीएम सविन जिस संजीदगी से जमीनी स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं, वह उत्तराखंड की नौकरशाही में दुर्लभ उदाहरण है। सामान्यतः डीएम का मतलब होता है – “देखेंगे, मिलेगा जवाब ऊपर से”, लेकिन सविन बंसल की शैली है – “आईए, बैठिए, यहीं हल करते हैं।” लाखामंडल में 76 शिकायतें दर्ज हुईं और अधिकांश का समाधान वहीं के वहीं, जैसे कोई फास्ट ट्रैक कोर्ट हो – बिना तारीख पर तारीख।

591 लोगों की स्वास्थ्य जांच, आयुष्मान कार्ड, दिव्यांग प्रमाण पत्र, चेक वितरण – यह सब एक दिन में, एक शिविर में। आमतौर पर ये काम महीनों तक सरकारी कार्यालयों की दहलीज पर ठोकरें खा रहे होते हैं। डीएम ने जिस सहजता से पेयजल, सड़क, सिंचाई, पेंशन और प्रमाण पत्रों से लेकर वनाग्नि रोकथाम तक की हर समस्या को गंभीरता से सुना, वह इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए ‘सरकारी काम’ केवल आदेश पारित करना नहीं, समाधान देना है।

तंज कहें या हकीकत, अधिकांश अफसरों के लिए ‘दुर्गम क्षेत्र’ एक फ़ाइल पर बना नक्शा होता है, लेकिन सविन बंसल के लिए यह जिम्मेदारी है—जिसे वह न केवल निभा रहे हैं बल्कि महसूस भी कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली में सरलता है, मगर निर्णयों में कठोरता भी—और यही संतुलन एक अच्छे प्रशासक की पहचान होती है।

वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं, दिव्यांगजनों को प्राथमिकता देना केवल भाषणों का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि इस शिविर में उसे व्यवहार में उतारा गया। ये वही डीएम हैं जिनके लिए “जन विश्वास” कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि रोज़ का प्रशासनिक धर्म है।

कुल मिलाकर, लाखामंडल का यह शिविर एक संदेश है—सरकारी सिस्टम अगर चाहे तो आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक न सिर्फ पहुँच सकता है, बल्कि उसे महसूस भी करवा सकता है कि वह अकेला नहीं है। और हां, ऐसे डीएम रोज़-रोज़ नहीं मिलते, ये ‘फील्ड अफसर’ हैं—फीलिंग वाले अफसर।

Khushi
Author: Khushi

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