“धामी का चाबुक: हरिद्वार घोटाले में अफसरशाही की गर्दन पर गिरी गाज, नौकरशाही में मचा हड़कंप”

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हरिद्वार में ज़मीन घोटाले की बदबू आखिरकार सचिवालय तक पहुंच गई और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐसा चाबुक चलाया कि नौकरशाही में भूचाल आ गया। ये पहला मौका है जब किसी राज्य की सत्ता में बैठी सरकार ने खुद अपनी ही ब्यूरोक्रेसी की चूकों पर इतना कड़ा रुख अपनाया है। अब तक जो अफसर कुर्सी के गुरूर में आंखें चुरा लेते थे, उन्हें अब खुद को शीशे में देखने की फुर्सत नहीं मिल रही होगी।

15 करोड़ की कूड़े के ढेर के पास वाली जमीन को 54 करोड़ में खरीदना… सुनकर ही आंखें फट जाएं, मगर अफसरों ने आंखें मूंद ली थीं। ऐसा मालामाल सौदा जैसे कि किसी प्लॉट में सोना उगता हो! न बोली, न पारदर्शिता, न ज़रूरत — बस सरकारी पैसे से दलाली की खेती। लेकिन इस बार फसल काटने नहीं दी गई, बल्कि खेत ही जोत दिया गया।

मुख्यमंत्री धामी ने साफ कर दिया कि उत्तराखंड में अब “पद” नहीं, “कर्तव्य” और “जवाबदेही” चलेगी। जिलाधिकारी कर्मेन्द्र सिंह, एसडीएम अजयवीर सिंह और पूर्व नगर आयुक्त वरुण चौधरी — तीनों के नाम नौकरशाही के बड़े दरबारियों में गिने जाते थे, लेकिन इस बार रथ से नीचे उतार दिए गए। उन्हें शायद लगा था कि फाइलों में खेल हो जाएगा, लेकिन धामी की नज़र में अब फाइलों से ज्यादा जनता की आंखें हैं।

जिन अफसरों के चेहरे पर रौब हुआ करता था, आज वही चेहरे निलंबन पत्र के नीचे झुके हैं। नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारी, अभियंता, क्लर्क — सबको लाइन में खड़ा कर दिया गया है। हर चेहरे पर अब केवल एक ही सवाल है — अगला नंबर किसका?

विजिलेंस जांच की सिफारिश कर सरकार ने ये भी साबित कर दिया कि अब दिखावटी नोटिस नहीं, ठोस कार्रवाई होगी। ये वो उत्तराखंड नहीं जहां भ्रष्टाचार की परछाई से भी डरकर फाइलें दबा दी जाती थीं। अब तो भ्रष्टाचार की गर्दन पर सीधा हाथ रखा गया है।

धामी सरकार का ये कदम ना सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अमले को आईना दिखाने वाला है। जो अफसर कल तक खुद को “बॉस” समझते थे, उन्हें अब समझ में आ गया होगा कि जनता का सेवक होने का मतलब क्या होता है।

‘न कोई बच पाएगा, न कोई छिप पाएगा’ — ये नारा अब सिर्फ भाषण नहीं, एक क्रियात्मक सच्चाई बन गया है। मुख्यमंत्री धामी की जीरो टॉलरेंस नीति ने सिद्ध कर दिया कि अगर सरकार चाहे, तो सिस्टम भी सुधर सकता है। अफसरों की चमक-धमक के पीछे जो अंधकार छिपा था, वो अब बेनकाब है।

अब सवाल सिर्फ एक — क्या बाकी राज्यों की सरकारें भी इतनी हिम्मत दिखा पाएंगी? या फिर धामी का चाबुक बाकी जगहों के लिए सिर्फ एक चेतावनी ही बना रहेगा?

Khushi
Author: Khushi

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