
राजा तो सुना था किताबों में होते हैं, लेकिन इस दौर के राजा तो पेंशन और पगार के नकाब में छुपे होते हैं। वरिष्ठ IRS अधिकारी अमित कुमार सिंगल के ठिकानों पर जब CBI ने दस्तक दी, तो घर नहीं, खजाना खुल गया।
सरकारी पद पर बैठकर “देश सेवा” करने वाले साहब की कोठी से ₹1 करोड़ की नकदी, 3.5 किलो सोना, 2 किलो चांदी, और हीरे-जवाहरात मिले। मानो किसी रियासत का तिजोरीखाना हो। यही नहीं, 25 बैंक खातों और दर्जनों अचल संपत्तियों के दस्तावेजों ने साफ कर दिया कि “सैलरी से सेविंग” का जो पुराना फॉर्मूला होता था, वो अब “सिस्टम से सेंधमारी” में तब्दील हो चुका है।
आश्चर्य की बात ये है कि ये सब देखकर कोई चौंका नहीं—क्योंकि अब भ्रष्टाचार पर अविश्वास नहीं, बल्कि भरोसा होता है। हर बड़ी पोस्ट अब मलाई की दुकान है, जहाँ जनता टैक्स देती है और साहब “टैक्स से ऊपर” की संपत्ति जोड़ते हैं।
अब सवाल यह नहीं कि उन्होंने ये सब कैसे जोड़ा, सवाल यह है कि कितने और “सिंगल” सिस्टम में ऐसे “मल्टीपल” सम्पत्ति वाले बैठे हैं? शायद इसी वजह से आम जनता के लिए सब्सिडी हो या सेवा, सब “फाइलों में लंबित” पड़ी रहती है, और उधर अधिकारी वर्ग के लिए ‘फॉर्चूनर’ से लेकर ‘फार्महाउस’ तक सब एक्सप्रेस डिलीवरी में आ जाता है।
IRS का फुल फॉर्म अब इन दिनों “Income Redistribution Strategy” जैसा लगता है—जनता से टैक्स लो और राजा साहब के राजमहल में लगा दो।
क्या कार्रवाई होगी? कुछ दिन की सुर्खियां, कुछ बयान, और फिर सिस्टम वही ढाक के तीन पात। लेकिन हाँ, राजा साहब का ताज अब उतर चुका है, बस देखना ये है कि अगला “राजा” किस फाइल में छुपा बैठा है।








