
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जब नैनीताल में अधिकारियों के बीच बैठे तो उनकी बातों में कहीं भी घुमा-फिराकर बोलने का लहजा नहीं था। सीधी बात—भ्रष्टाचार नहीं चलेगा, जवाबदेही तय होगी। यानी अब विभागीय कुर्सियों पर बैठकर “फ़ाइल घूम रही है”, “प्रक्रिया में है”, “निर्देश ऊपर से आने हैं” वाले घिसे-पिटे बहाने नहीं चलेंगे। ये बैठक नहीं थी, एक साफ संदेश था—सरकार अब ‘सुन’ नहीं रही, सुधार रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा, 10 से 1 बजे तक अफसर दफ्तर में जरूर बैठें ताकि जनता मिल सके। अब ये बात सुनकर कुछ अफसरों की चाय का स्वाद जरूर कड़वा हुआ होगा, जो अक्सर जनता से बचने की ‘मीटिंग मोड’ में रहते हैं। लेकिन अब सीएम खुद कह रहे हैं—जनता आएगी, और अफसर मिलेंगे, तो “बैठक में व्यस्त हैं” का नारा अब इतिहास बनने वाला है।
1064 भ्रष्टाचार शिकायत नंबर की बात करते हुए सीएम ने बताया कि भ्रष्टाचार पर सीधे एक्शन होगा। यानी अब घूस की गंध आई नहीं कि सिस्टम एलर्ट मोड में आ जाएगा। काश कुछ विभागों में इस नंबर की घंटी ही चेतावनी बन जाए!
जमरानी बांध, सूखा ताल, कैंची धाम—सीएम ने योजनाएं भी गिनाईं और टाइमलाइन भी दी। यानी अब काम “होंगे” नहीं, होने ही चाहिए, और अगर नहीं हुए, तो कार्रवाई निश्चित। यही बात उन्होंने साफ शब्दों में कही—”मानकों के अनुरूप कार्य न होने या अनावश्यक देरी पर कार्रवाई तय है।”
वैसे अब उत्तराखंड में अफसरशाही को समझ लेना चाहिए कि मुख्यमंत्री धामी फोटोशूट फाउंडेशन स्टोन के युग से बाहर आ चुके हैं, अब वो गति और गुणवत्ता के युग में दाखिल हो चुके हैं। मेडिकल कॉलेजों का बजट बढ़ाया जा रहा है, सीमावर्ती क्षेत्रों में सुविधाएं लाने की बात हो रही है—यह सिर्फ़ कागज़ी घोषणाएं नहीं रहनी चाहिए, वरना कागज़ से ज्यादा वजन अब सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो का होगा।
काशीपुर के अधीक्षण अभियंता को तत्काल सस्पेंड करने के निर्देश ने यह दिखा दिया कि अब फील्ड में बैठे ‘साहब लोग’ भी खुद को अछूता न समझें। ऊपर से नीचे तक जवाबदेही तय होगी—और हां, जवाबदेही का मतलब सिर्फ़ “माफीनामा” नहीं, बल्कि एक्शन है।
सीएम ने कैंपों के ज़रिए जनता की समस्याओं को स्थानीय स्तर पर सुलझाने की बात की। यानी अब “जिले जाओ, चक्कर लगाओ” सिस्टम की छुट्टी होने वाली है। अफसर अब खुद जनता के दरवाजे पर पहुंचेंगे। यह एक सकारात्मक दबाव है, और अफसरशाही को इसे जनसेवा का सम्मानजनक अवसर समझकर निभाना होगा, वरना आगे का रास्ता 1064 पर खत्म हो सकता है।
इस पूरी बैठक का सार यही है—विकास दिखना चाहिए, योजनाएं ज़मीन पर उतरनी चाहिए और अधिकारी कुर्सियों से उठकर चौपाल में बैठने को तैयार होने चाहिए।
मुख्यमंत्री धामी ने जो कहा, वो अब सरकारी पत्रों की फाइल में दबने के लिए नहीं, जनता की नजरों में चढ़ने के लिए है। जो अफसर इस बदलाव की हवा को समझ जाएंगे, वे व्यवस्था के भविष्य का हिस्सा होंगे। जो नहीं समझेंगे, उनके लिए “सस्पेंड” शब्द केवल एक डर नहीं, नज़दीकी सच बन सकता है।








