

डॉक्टर्स डे के मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का शासकीय आवास में चिकित्सकों से मिलना और उन्हें सम्मानित करना सिर्फ एक औपचारिक आयोजन भर नहीं था। यह एक संदेश था—एक सोच का, एक दृष्टिकोण का, और एक संवेदनशील नेतृत्व का, जो व्यवस्था को आंकड़ों से नहीं, आत्मा से देखता है।
धामी न तो भारी-भरकम शब्दों के पीछे छिपते हैं और न ही मंच से महज़ जुमले उछालते हैं। वे ज़मीनी हकीकत को छूते हैं, और जब वे डॉक्टरों से मिलकर कहते हैं कि “आप धरती के भगवान हैं, और आपकी छवि जीवित रहनी चाहिए”, तो वह सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की पुनः स्थापना है।
आधुनिक राजनीति में जहां अक्सर नेताओं का ‘प्रेसेंस’ होता है, धामी वहीं ‘कनेक्ट’ पर भरोसा करते हैं। डॉक्टरों के बीच बैठकर, उनके कंधों पर हाथ रखकर, उनकी आंखों में देखकर बात करना—ये चीज़ें टेलीप्रॉम्प्टर से नहीं आतीं, ये दृष्टिकोण और दिल से आती हैं।
और तंज भी देखिए—जहां कुछ राज्य सरकारी अस्पतालों में ‘डॉक्टर नहीं, टेम्परेरी पोस्टर’ चिपका कर काम चला रहे हैं, वहां उत्तराखंड सरकार मेडिकल कॉलेज हर जिले में खोलने की योजना पर काम कर रही है। 58 लाख से ज्यादा आयुष्मान कार्ड और 11 लाख से अधिक मरीजों को 2100 करोड़ का कैशलेस इलाज देना कोई छोटा आंकड़ा नहीं, ये नीति नहीं, नीयत का परिचय है।
207 तरह की पैथोलॉजी जांचें फ्री कर देना केवल हेल्थ बजट में एक कॉलम जोड़ना नहीं, यह उस ग्रामीण महिला के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश है, जो सालों से थायरॉइड की जांच टाल रही थी क्योंकि उसे घर चलाना ज़्यादा ज़रूरी लगता था।
धामी का यही अंदाज़ उन्हें औरों से अलग करता है—जहां नेता अपनी छवि बनाने में लगे हैं, धामी डॉक्टरों की छवि बचाने की बात कर रहे हैं।
सच कहें तो डॉक्टर्स डे पर धामी ने डॉक्टर्स को ‘सम्मान’ नहीं दिया, बल्कि अपने नेतृत्व की सेहत दिखा दी।








