
जनता दरबार का नजारा बड़ा दिलचस्प था। दूर-दराज़ के गाँवों से लेकर शहर की बस्तियों तक के लोग अपने-अपने दुख-दर्द की पोटली लेकर जिलाधिकारी सविन बंसल के सामने पहुँचे। किसी का बीमा क्लेम कंपनी खा गई, तो किसी को बैंक किस्त की फाँसी कस रहा है। कहीं बहू अपनी सास को घर से निकाल रही है, तो कहीं बुजुर्ग बहन-भाई भोजन और भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं।
144 समस्याएँ एक ही दिन में! मानो पूरा ज़िला अपना हिसाब-किताब लेकर आ गया हो। डीएम भी एक-एक शिकायत पर ऐसे डटे जैसे कोई वकील अपने मुवक्किल की पैरवी करता है। किसे ATR माँगनी है, किस पर ताला लगाना है, कहाँ कुर्की करनी है, कहाँ मुआवजा बाँटना है—सबका हिसाब उसी मंच पर।
बीमा कंपनियाँ विधवाओं को रुला रही हैं, बैंक ब्याज का चाबुक चला रहे हैं, बहुएँ बुजुर्गों को तंग कर रही हैं और विभागीय अफसर फाइलों में जनता का जीवन उलझाए बैठे हैं। लेकिन जनता दर्शन में जैसे सबकी पोल खुल गई। एमडीडीए से लेकर जल संस्थान तक, श्रम विभाग से लेकर नगर निगम तक—हर विभाग का एक-एक कलंक सामने आया और डीएम ने तल्ख अंदाज़ में सबको कटघरे में खड़ा कर दिया।
विडंबना देखिए, सरकार की योजनाओं का ढोल पीटा जाता है कि हर जरूरतमंद को राहत और सहारा मिलेगा, पर जब वक़्त आता है तो विधवाएँ दर-दर भटकती हैं, बुजुर्ग अदालत के चक्कर काटते हैं और लोग सालों से राशन की दुकान तक पहुँचने के लिए 6 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। यही है हमारे “जनकल्याणकारी तंत्र” की हकीकत।
हाँ, इतना मानना पड़ेगा कि जिलाधिकारी बंसल ने मंच पर बैठकर सिर्फ़ सुनवाई नहीं की, बल्कि मौके पर ही समाधान भी थमाया। यही वजह है कि भीड़ सिसकते हुए नहीं, थोड़ी राहत लेकर बाहर निकली। जनता दर्शन दरअसल एक आईना है—जहाँ जनता अपनी तकलीफ़ें दिखाती है और प्रशासन अपनी ईमानदारी। फर्क बस इतना है कि इस आईने को हर हफ्ते पोंछा जाए या चुनाव से पहले चमकाया जाए।
क्या ग़ज़ब की विडंबना है—जन सुनवाई में “जनता” की सुनवाई तभी होती है जब जनता दरबार सजाया जाए। बाकी 364 दिन तो वही पुरानी कहानी—फाइलें मोटी होती रहती हैं और परेशान जनता और भी दुबली।








