रोज़गार की लड़ाई नहीं, भीड़ से कमाई का खेल — जागो छात्रो, वरना बिक जाएगा भविष्य

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धरना शुरू हुआ था बेरोज़गार युवाओं की उम्मीद और आवाज़ के नाम पर, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, असली चेहरा धीरे-धीरे बाहर आने लगा। जो आंदोलन न्याय और रोज़गार की मांग करने वाला होना चाहिए था, वहाँ अब सिर्फ राजनीतिक खेल और अपने फायदे का ठेला सज गया है।

भीड़ को इकट्ठा करना आसान है, नारे लगवाना आसान है, लेकिन असली मज़ा तब आता है जब वही भीड़ किसी के मुनाफ़े का जरिया बन जाए। युवाओं के उत्साह और भरोसे को हथियार बना कर उन्हें उकसाना, माहौल खराब करना और अपना बचाव करना—यही असली खेल है।

धरना स्थल अब आंदोलन कम और मुनाफ़े का अड्डा ज़्यादा लगता है। जो कल तक युवाओं की आवाज़ का हिस्सा बनकर उनके हक़ की बात कर रहे थे, वही आज उनकी उम्मीदों और समय को लूटकर अपने धंधे में लगे हुए हैं। “आज़ादी के नारे” और “छात्रों की आड़” केवल पर्दा है, असली काम अपने लिए बचाव और लाभ कमाना है।

और सबसे बड़ी ठेस यह है कि असली मुद्दा—रोज़गार—पीछे छूट चुका है। युवा सोच रहे हैं कि वे आंदोलन का हिस्सा बन रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी मेहनत और जज़्बा सिर्फ किसी के एजेंडे का औज़ार बन गया है।

समझना होगा कि हर नारा, हर भीड़ और हर धरना कोई मासूम प्रयास नहीं, बल्कि एक चालाक योजना का हिस्सा है। इसे पहचानना और अपने हक़ के लिए लड़ाई खुद लड़ना ही असली बदलाव है। वरना, जो आज आपके हक़ की बात कर रहे हैं, वही कल आपके भविष्य की सबसे बड़ी बोली लगा देंगे।

Khushi
Author: Khushi

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