
15 मिनट में पूरे आंदोलन को शांत कर देना कोई मामूली बात नहीं है। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने वही किया जो बहुत से बड़े नेता करने में असफल रहे — सीधे युवाओं के बीच पहुंचे, उनकी बात सुनी, सीबीआई जांच की संस्तुति दी और माहौल को तुरंत शांत किया। वही लोग जो अब श्रेय लेने की होड़ में लगे हैं, उन्हें भी यह खिंचाई सुननी चाहिए कि असली काम कदम उठाने में होता है, सिर्फ मंचों और मीडिया पर फोटो खिंचवाने में नहीं।
जो कोई नहीं कर पाया, धामी ने कर दिखाया। यही नेतृत्व की पहचान है। दिग्गज नेताओं को इससे सीख लेनी चाहिए कि जनता की आवाज़ दबाने से कुछ नहीं होता, उसे समझने और सही समय पर कार्रवाई करने में ही शक्ति है।
आज तक धामी ने युवाओं को कभी रूष्ट नहीं किया, जबकि पिछली सरकारों (2017-2021) में जनता को कितना सम्मान मिला, यह सबके सामने है। शिक्षिका उत्तरा पंत वाला वीडियो पूरे देश ने देखा, भगवान बद्री-विशाल और पंडा समाज के उत्पीड़न की तस्वीरें सभी के सामने हैं। पुलिसवालों के 4600 बंद होने की घटना भी याद है और उपनल, पीआरडी जैसी संगठनों का उत्पीड़न भी कोई छुपा नहीं सकता।
धामी का यह तरीका साफ संदेश देता है: जनता और युवाओं का सम्मान पहले, राजनीति बाद में। जो लोग सिर्फ बयानबाजी और श्रेय लेने में लगे हैं, उन्हें अब समझना चाहिए कि असली नेतृत्व निर्णय लेने और कार्रवाई करने में होता है, न कि केवल कैमरे के सामने मुस्कुराने में।








